तूलिकाओं के स्नेह से खिल उठीं सौड की उजड़ी दीवारें

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सौड़ गांव, टेहरी गढ़वाल, उत्तराखंड
पलायन का दंश झेल रहे चंबा ब्लाक के सौड गांव में खाली घरों की उजड़ी दीवारों पर पेंटिंग बना लौटाई रंगत
प्रोजेक्ट फ्यूल के तहत 100 से अधिक युवाओं ने 50 से अधिक वीरान घरों की दीवारों पर उकेरी ग्रामीण दिनचर्या
अमर उजाला के वरिष्ठ पत्रकार विनोद मुसान की कलम से
टिहरी जनपद के चंबा-धनोल्टी मार्ग पर बसा सौड गांव इन दिनों दीवारों पर खिलखिलाती पेंटिंग के कारण सुर्खियों में है। यहां कोई आर्ट गैलरी या वर्कशॉप नहीं चल रही, बल्कि पलायन के दंश से वीरान हो गए गांव की उजड़ी दीवारों पर कुछ उत्साही युवा रंग भर रहे हैं। ताकि दुनिया का ध्यान इस ओर आकर्षित कर सकें। ‘प्रोजेक्ट फ्यूल’ के तहत एक जून को शुरू हुई इस मुहिम में देश के विभिन्न हिस्सों से आए करीब 100 से अधिक युवा अब तक 50 से अधिक घरों की दीवारों पर विभिन्न प्रकार की आकृतियां उकेर चुके हैं।
इस अनूठे कार्य का श्रेय जाता है चंबा ब्लाक के कोट गांव निवासी युवा दीपक रमोला को। आर्मी स्कूल क्लेमेंटटाउन से स्कूलिंग करने के बाद मुंबई में रह रहे दीपक को पलायन का दर्द यहां खींच लाया। उन्होंने कुछ ऐसा करने की ठानी, जिससे पहाड़ में लगातार हो रहे पलायन की ओर दुनिया का ध्यान खींचा जा सके। इसके बाद ‘प्रोजेक्ट फ्यूल’ के तहत शुरू हुई गांव के खाली पड़े घरों की दीवारों को रंगों से भरने की मुहिम। दीपक के निर्देशन और हेड आर्टिस्ट पूर्णिमा सुकुमार के नेतृत्व में विभोर यादव, साबित तिश्केर, नीतिश यादव, श्रद्धा बख्शी, लैला बजीर अली, खाना, नीरव दोसी और अन्य युवा पिछले एक माह से रात दिन इस काम को अंजाम दिया। प्रोजेक्ट 30 जून को खत्म हो गया।

…तब सुबह-शाम खिलखिलाती थी यहां जिंदगी
यूं तो उत्तराखंड के हर कोने को प्रकृति ने खास नेमत बख्शी है, लेकिन सौड गांव की बात ही निराली है। प्रकृति की गोद में बसा ये गांव दूर से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। लेकिन दुर्भाग्य यहां रह रहे लोगों को ही यहां की अबोहवा रास नहीं आई। कुछ साल पहले तक गांव में 90 से अधिक परिवार निवास करते थे। लेकिन धीरे-धीरे गांव खाली होता गया। अब यहां रह रहे परिवारों की संख्या मात्र 12 रह गई है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव ने लोगों को गांव से पलायन करने पर मजबूर कर दिया। लोगों ने मूल गांव से इतर सुविधाजनक जड़ीपानी, कणाताल, ढांगधार, सनगांव, अंधियारगढी, पाताल देवी सहित अन्य स्थानों पर बसना शुरू कर दिया। जिसकी परणीति यह हुई की गांव धीरे-धीरे खाली होता चला गया। आज इस गांव के ज्यादातर मकान जीर्ण-शीर्ण स्थिति में पहुंच गए हैं। कुछ तो देखभाल के अभाव में पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो चुकें हैं। ये बात अलग है कि अब मुख्य सड़क से गांव तक करीब 11 किमी दूरी तक सड़क पहुंच चुकी है।

हर घर पर बने चित्र के पीछे है एक कहानी…
दीवारों पर उकेरे गए चित्रों के माध्यम से दिखाया जा रहा है कि पलायन से पहले यह गांव कितना खुशहाल था। गांव की जीवन शैली, दिनचर्या और कार्यों को इंगित करते यह चित्र उस दौर की तस्वीर पेश कर देते हैं। प्रोजेक्ट के प्रारंभिक चरण में सर्वे के माध्यम से हर घर की हिस्ट्री पता की गई। किस घर में कितने लोग रहते थे? उनकी दिनचर्या क्या थी? वह कौन सी खास बात थी, जिसके लिए फलां परिवार जाना जाता था। इसके बाद शुरू हुआ उसी जीवनशैली के अनुरूप दीवारों पर रंग भरने का काम। देश भर के चयनित चित्रकारों द्वारा प्रत्येक घर की दीवारों पर उनकी यादों को उकेरा है। हुक्का पीते बुजुर्ग और पास बैठी महिला, पेड़ों की छांव में विश्राम करती महिला, गांव में सामूहिक धान की रोपाई, खिलखिलाते बच्चे, खेत जोतती बैलों की जोड़ी, ढोल-दमाऊं पर थाप देते औजी, रेडियो पर समाचार सुनते लोग, पल्लू से झांकता दुल्हन का चेहरा और स्कूल जाते बच्चे आदि खुशहाल गांव की बेहतर तस्वीर पेश करते हैं।

ताकि लोग अपने गांव को नई दृष्टि से देख सकें…
चित्रों के द्वारा गांव के जीवन के पाठ का दस्तावेजीकरण किया जा रहा हैं। यह उत्तराखंड का पहला गांव है, जहां इस तरह की पहल की जा रही है। इसका मकसद पहाड़ में पलायन को रोकने के साथ ही पर्यटन को बढ़ावा देना भी। वर्तमान में वे लोग भी इन घरों को देखने आ रहे हैं, जो इन्हें वीरान छोड़ चुके हैं। अच्छी बात ये है कि बहुत से लोगों ने अपने घरों को फिर से आबाद करने की ठानी है। सौड गांव निवासी सूर्या रमोला कहते हैं की सुविधाओं के अभाव में लोगों ने गांव छोड़ा। लेकिन अब तो गांव तक सड़क भी पहुंच चुकी है। उम्मीद है कि अब लोग वापस अपने घरों की पुन: मरम्मत करेंगे और गांव लौटेंगे। प्रोजेक्ट फ्यूल की यह मुहिम न केवल गांव छोड़ चुके लोगों को वापस लौटने के लिए प्रेरित करेगी, बल्कि विलेज टूरिज्म के तहत होम स्टे को भी बढ़ावा मिल सकेगा।

कौन हैं दीपक रमोला
बहुमुखी प्रतिभा के धनी दीपक रमोला ने 2009 में मुंबई विश्वविद्यालय से मॉस मीडिया स्टडीज में टेड स्पीकर (गोल्ड मेडलिस्ट), शिक्षक, लेखक, अभिनेता, गीतकार और एक पत्रकार भी हैं। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, कैसर थिएटर प्रोडक्श और नो लाइसेंस के साथ काम करने के बाद दीपक ने थियेटर में अनुभव हासिल किया है। इसके बाद प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हाउस दोनों के साथ काम भी किया है। एक अभिनेता के रूप में दीपक ने राजश्री प्रोडक्शन के ‘आइ लाइ लाइफ ’ में काम किया है। जबकि सलमान खान के साथ ‘बॉडीगार्ड’ में और धारावाहिक ‘ससुराल सिमर का’ में भी काम किया है। दीपक नें हिंदी फिल्म ‘मांझी द माउंटेन मैन’ और ‘बजीर’ सहित कई फिल्मों के लिए गीत भी लिख चुके हैं। बकौल दीपक, ‘मेरी मां पुष्पा रमोला मात्र पांचवीं कक्षा तक पढ़ी थीं, लेकिन उनके पास ज्ञान का अथाह भंडार था’। जब उन्होंने इस बारे में मां से पूछा तो उन्होंने कहा- जिंदगी का सबक दुनिया का हर पाठ पढ़ा देता है। तभी से उनके दिमाग में आम लोगों के ज्ञान को सीखने, बचाने और उसे बांटने की प्रवृति पैदा हुई। इसी के तहत उन्होंने नौ साल पहले ‘प्रोजेक्ट फ्यूल’ की शुरूआत की।

साभारः दैनिक अमर उजाला

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