मुझे नई बाजू नहीं, नया जीवन मिला है…थैक्स डॉर्क्ट्स

गुड न्यूज की इस कड़ी में आज हम लेकर आए हैं डॉ. हरीश घिल्ड़ियाल द्वारा सुधारे गए एक पेचीदा केस को। मरीज के साथ घटी अनहोनी की कहानी जितनी बुरी थी, उतना ही सुखद है इस कहानी का अंत। किसी के जीवन में इससे बड़ी खुशी की बात क्या हो सकती है कि दुर्घटना के बाद उसकी एक बाजू कटने वाली हो और कोई आकर उसे बचा ले। इस केस में एक नौजवान को डॉ. हरीश घिल्ड़ियाल और उनकी टीम ने ऐसी ही रहमत बख्सी है। तो आइये जानते हैं क्या हुआ था इस नौजवान के साथ.....

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घटना 12 सितंबर 17 शाम चार बजे की है। जब हरिद्वार के रहने वाले 27 वर्षीय नौजवान दिगंबर 15 फीट की उंचाई से काम करने हुए हाथ के बल नीचे जा गिरे। इससे उनकी बाईं कोहनी और कलाई की हड्डी पूरी तरह चकनाचूर हो गई। यहां तक की बांह में खून ले जाने वाली नाड़ी भी पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। जिसकी वजह से दिगंबर की बाजू कटने की नौबत आ गई थी।

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इस घटना के बाद परिजनों द्वारा दिगंबर को पहले मेट्रो अस्पताल, हरिद्वार और फिर हिमालयन अस्पताल जौलीग्रांट लाया गया। लेकिन दोनों ही जगह दिगंबर और उसके परिजनों को नाउम्मीदी मिली। आखिरकार किसी ने उन्हें कैलाश अस्पताल, देहरादून के बारे में जानकारी दी। जहां माइक्रोवेस्कूलर सर्जरी के मास्टर डॉ. हरीश घिल्ड़ियाल मौजूद थे। रात करीब आठ बजे दिगंबर कैलाश अस्पताल पहुंचा, जहां दिगंबर की हालत को देखते हुए डॉ. घिल्ड़ियाल और उनकी टीम ने तुरंत आपरेशन करने का फैसला किया। घंटे भर की भी और देरी होती तो इतना तय था कि दिगंबर को अपना एक हाथ गंवाना पड़ता। डॉक्टरों के लिए दिगंबर का हाथ बचाना एक मुश्किल चुनौती थी। रात करीब साढ़े नौ बजे आपरेशन शुरू हुआ जो पूरी रात चला।

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इस इमरजेंसी सर्जरी में सीनियर आथ्रोपीडिशियन डॉ. विनीत त्यागी ने टूटी हड्डी को जोड़ा। रिकंस्ट्रिक्टिव माइक्रोवेस्कूलर सर्जन डॉ. हरीश घिल्ड़ियाल ने क्षतिग्रस्त खून की नाड़ी और उसके उपर की त्वचा का माइक्रोवेस्कूलर सर्जरी से पुनर्निर्माण कर खून का दौरा ठीक करके उसको कटने के खतरे से बचाया।
इस केस के बारे में जब हमने डॉ. घिल्ड़ियाल से बात की तो उन्होंने बताया कि बांह में खून की मुख्य नाड़ी ब्रेकियल आर्टरी में खून के दौरे का रूकना एक अत्यंत गंभीर समस्या थी। समय से इसे ठीक न कर पाने की स्थिति में यह तक था कि बांह काटनी पड़ती। खून की मुख्य नाड़ करीब 13 सेंटीमीटर तक क्षतिग्रस्त थी। साथ ही उसकी उपरी त्वचा भी पूरी तरह नष्ट हो चुकी थी।

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खून की कटी नाड़ और त्वचा का माइक्रोस्कूलर पुनर्निर्माण के लिए सुबह तक इंतजार नहीं किया जा सकता था। क्योंकि बांह तथा हाथ खून का दौरा प्राप्त नहीं कर रहे थे। खून के दौरे को बनाने के लिए एकमात्र उपाय फलैप के रूप में कटी हुई खून की नाड़ की जगह माइक्रोवेस्कूलर सर्जरी विधि द्वारा ही स्थानांत्रित किया जा सकता था। जिसे हमने सर्जरी में सफलता पूर्वक पूरा किया।
12 घंटे चली इस सर्जरी ने दून में माइक्रोवेस्कूलर सजरी की नई राह खोली है। इस पूरी प्रकिया में एनस्थिसिया विभाग के डॉक्टर पंकज सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। जिन्होंने मरीज को 12 घंटे तक एनस्थिसिया के महत्वपूर्ण मापदंडों को पूरा करते हुए सफल आपरेशन में अपनी भूमिका निभाई।
चित्रों के माध्यम से आप देख सकते हैं कि यह कितना मुश्किल केस था। कैलाश हास्पिटल के डॉक्टरों की टीम को आप भी बधाई दे सकते हैं, जिन्होंने न सिर्फ दिगंबर को नया जीवन दिया, बल्कि इस तरह के केस में दूसरे लोगों को भी राह दिखाई है। इस केस के माध्यम से चिकित्सकों के इस दल का कहना है कि ऐसे केस में सबसे महत्वपूर्ण होता है समय पर उपचार। जैसे-जैसे समय बीतता जाता है मरीज के कटे-फटे अंगों को बचाने की संभावनाएं उतनी ही क्षीण होती जाती हैं।

जारी…..

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