ऐसे शुरू करें गॉट फार्मिंग

दून की बेटी श्वेता ने एग्रो फार्मिंग में जमाए पैर

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गोट फार्मिंग में नई तकनीक के साथ आगे बढ़ रही श्वेता
रानीपोखरी स्थित लिस्ट्राबाद गांव में शुरू किया काम
बकरी के अलावा, मुर्गी और गाय पालन भी कर रही
आधुनिक प्लेटफार्म और सीसीटीवी कैमरों से लैस है फार्म
अमर उजाला के वरिष्ठ पत्रकार विनोद मुसान की कलम से

कभी भेड़-बकरी पालन को दोयम दर्जे का कार्य माना जाता था, लेकिन रानीपोखरी की श्वेता तोमर ने इसी काम में नए आयाम गढ़े हैं। फैशन डिजाइनिंग की चकाचौंध वाली दुनिया को छोड़ श्वेता ने इसी व्यवसाय को अपना पैशन बना लिया। यूं तो श्वेता अपने फार्म में गो-पालन, मुर्गी पालन भी कर रही हैं, लेकिन उनके केंद्र में बकरी पालन सबसे ऊपर है। एक ऐसा व्यवसाय, जिसे शुरू करने से पहले ही लोगों को बकरी की बीट की बदबू आने लगती है, लेकिन श्वेता नई तकनीक के साथ इस काम को अंजाम दे रही हैं। फार्म में घुसते ही आपको हर चीज व्यवस्थित और नई तकनीक से लैस नजर आती है। बकरी पालन के लिए बना प्लेटफार्म और वहां लगे उच्च तकनीक के सीसीटीवी कैमरे इसकी तस्दीक करते हैं।
रानीपोखरी न्याय पंचायत क्षेत्र के भोगपुर गांव की रहने वाली श्वेता तोमर ने एग्रो फार्मिंग की शुरूआत कर अपने पिता स्व. प्रेम सिंह तोमर का सपना पूरा किया है। विज्ञान में स्नातक और उसके बाद निफ्ट से फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने के बाद श्वेता ने नोएडा और दिल्ली में कुछ साल फैशन इंडस्ट्री में ही काम किया। लेकिन श्वेता के दिमाग में हमेशा पिता का सपना घूमता था, वह अपना एग्रो फार्म खोलना चाहते थे। आखिरकार श्वेता ने जॉब छोड़कर पिता के सपने को पूरा करने की ठानी और उन्हीं के नाम पर जनवरी, २०१६ में प्रेम एग्रो फार्म की स्थापना की। चार बहनों में तीसरे नंबर की श्वेता के पास आज फार्म में अलग-अलग नस्लों की सौ से भी ज्यादा बकरियां हैं। इनमें सिरोही, बरबरी, जमना पारी और तोता पारी शामिल हैं। श्वेता के फार्म में पांच हजार से लेकर एक लाख तक के बकरे मौजूद हैं। बकरियों के लिए बने विशेष तरह के प्लेटफार्म के नीचे ही मुर्गी पालन किया जाता है। इन पर नजर रखने के लिए शेड के अलावा पूरे फार्म में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। गोशाला अलग से बनाई गई है। बकौल श्वेता, ‘जमीन अपनी थी, पति रोबिन के साथ मिलकर करीब एक करोड़ का प्रोजेक्ट बनाया था, लेकिन कोई भी बैंक इतना लोन देने को तैयार नहीं था। फिर पीएनबी ने ३० लाख का लोन पास किया। इसके बाद आठ लाख रुपये खुद से लगाकर फार्म शुरू कर दिया।Ó
श्वेता के पति बंगलूरू में आईटी के क्षेत्र में काम करते हैं। वहीं श्वेता ने गोट फार्मिंग के बारे में सुना और देखा। इसके बाद कई फार्म विजिट किए। आज श्वेता इस काम में काफी हद तक महारत हासिल कर चुकी हैं। वह खुद बकरियों का दूध निकालने से लेकर उनकी देखभाल और छोटी-मोटी दवा-दारू भी कर लेती है। जरूरत पडऩे पर वह खुद लोडर वाहन चलाकर ले जाती हैं। दूध के अलावा बकरियों की बिक्री इंटरनेट के माध्यम से भी करती हैं। पांच बीघा खेत में बने फार्म में ही बोरवेल और चारागाह तैयार किया गया है। श्वेता बताती हैं काम शुरू करने में यूं तो उसे सरकारी स्तर पर बहुत सी दिक्कतों का सामना करना पड़ा, लेकिन पशुपालन विभाग का उसे शुरू से भरपूर सहयोग मिलता रहा है।
खुद किया पिता का क्रियाकर्म
क्षेत्र में श्वेता कर्मठता और जिंदादिली के सब कायल हैं। माता-पिता की चारों संतान बेटी के रूप में पैदा हुईं। पिता की मृत्यु के बाद जब क्रियाकर्म की बारी आई तो श्वेता खुद से आगे आई। बेटे की तरह ही उसने और बहनों सभी कर्मकांड पूरे किए। पिता की चिता को किसी लड़की द्वारा अग्नि देने का क्षेत्र में यह पहला मामला था, जो उस समय अखबारों की सुर्खियां भी बना।

कुछ समय पूर्व तक बकरी पालन को इतना महत्व नहीं दिया जाता था, लेकिन अब लोग इसे व्यावसायिक तौर पर अपना रहे हैं। विभाग द्वारा भी समय-समय पर इसके लिए ट्रेनिंग दी जाती है। श्वेता ने भी विभाग से ट्रेनिंग लेने के बाद अपना व्यवसाय शुरू किया। इसमें १० बकरियों पर एक बकरा रख छोटे स्तर पर भी यह काम शुरू किया जा सकता है। इसकी कुल लागत करीब एक से डेढ़ लाख रुपये आती है।
– डॉ. अविनाश आनंद, मुख्य अधिशासी अधिकारी, उत्तराखंड भेड़ एवं ऊन विकास बोर्ड

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