मंगलानंद डबराल ने उत्तराखंड में किवी उगाकर कर दिया कमाल

खेती किसानी के तहत आज हम आपको ऐसे किसान से मिला रहे हैं, जिन्हें अब लोग खेत-खलिहान की चलती-फिरती पाठशाला कहते हैं। चार लोगों के बीच जहां खड़े हो जाएं, वहीं उनकी क्लास शुरू हो जाती है। वे सिर्फ बातें नहीं करते, बल्कि उन्होंने करके दिखाया है। नाम है मंगलानंद डबराल। उम्र-80 साल। चौपड़ीयाल गांव से लौटकर अमर उजाला के वरिष्ठ पत्रकार विनोद मुसान की ये खास रिपोर्ट साभार....

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मसूरी-धनोल्टी वाया चंबा। यूं तो ये रूट वर्षों से अपनी बेमिसाल प्राकृतिक सुंदरता और पर्यटन के लिए जाना जाता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में नगदी फसलों और फलदार पट्टी के रूप में क्षेत्र ने नई पहचान बनाई है। इसी रूट पर कणाताल के पास स्थित है चौपड़ीयाल गांव। जहां खेती-किसानी में नित नए प्रयोगों के जरिए किसान मंगलानंद डबराल ने न सिर्फ आम लोगों बल्कि कृषि वैज्ञानिकों का ध्यान भी खिंचा है। खेती में विभिन्न फसलों के सफल उत्पादन के बाद आज वे उत्तराखंड के पहले ऐसे किसान के रूप में पहचान बना चुके हैं, जो विदेशी फल किवी का बड़े पैमाने पर उत्पादन कर रहे हैं।
मंगलानंद दो पौधों से शुरूआत के बाद आज किवी के बड़े बागवान काश्तकार बन गए हैं। इन्होंने व्यावसायिक तौर पर इसके उत्पादन के साथ अपने प्रयोगों के जरिए फल के आकार में वृद्धि करने में भी सफलता पाई है। वैज्ञानिक विधि से इस फल की पौध तैयार कर आज वे दूसरे किसानों को भी किवी उत्पादन के लिए प्रेरित कर रहे हैं। मंगलानंद पांचवीं पास ऐसे काश्तकार हैं, जिनसे सीखने और सीखाने के लिए किसानों से लेकर कृषि वैज्ञानिक तक आए दिए उनके घर पहुंचते हैं। वे फसलों के लिए खुद तैयार की गई वर्मी कंपोस्ट का इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा गोमूत्र, राख, अखरोट, नीम इत्यादि से जैविक विधियों को अपनाकर कीटनाशक तैयार करते हैं और दूसरों को भी इसकी विधि बखूबी बताते हैं। आज क्षेत्र के पांच सौ से भी अधिक किसान उनकी राह पर चलकर जैविक खेती कर रहे हैं।

पंतनगर यूनिवर्सिटी ने आड़ू को दिया मंगलानंद का नाम

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मंगलानंद डबराल ने खेती-किसानी में प्रयोगों के जरिए मिसाल कायम की है। उन्होंने अपने घर में ही आड़ू की एक ऐसी प्रजाति विकसित की है, जो ऑफ सीजन में फल देती है। यह आड़ू आकार में बड़ा होने के साथ बेहद रसीला और मीठा भी है। आड़ू की प्रजाति को उन्होंने पंतनगर स्थित जीबी पंत कृषि एवं औद्योगिक विश्वविद्यालय के सम्मुख प्रस्तुत किया। लंबे शोध के बाद संस्थान के वैज्ञानिकों ने माना कि ये आड़ू की नई प्रजाति है। जिसे संस्थान के वैज्ञानिक ने ‘अर्ली एम रेड’ आड़ू का नाम दिया। इसमें ‘एम’ अक्षर मंगलानंद के नाम को प्रदर्शित करता है।

उत्तराखंड के लिए वरदान साबित हो सकती है किवी

IMG_4538किवी एक विदेशी फल है, जो चीन के अलावा ब्राजील, न्यूजीलैंड, इटली ओर चिली जैसे देशों में उगाया जाता है। लेकिन मंगलानंद डबराल ने उत्तराखंड में किवी का सफल उत्पादन कर भविष्य की राह दिखाई है। वे बताते हैं कि आगराखाल से लेकर केदारनाथ तक किवी का उत्पादन किया जा सकता है। मतलब, जहां भी ठंडी जलवायु है, वहां इसका उत्पादन आसानी से किया जा सकता है। किवी की पौध जनवरी में लगाई जाती है। तीन साल बाद यह पौध फल देने लगती है। अप्रैल में फूल आते हैं ओर अक्तूबर-नवंबर में फसल तैयार हो जाती है। बंदर इस फसल को नुकसान नहीं पहुंचाते और ओलावृष्टि में भी ये महफूज रहती है। इसलिए उत्तराखंड के लिए यह एक मुफीद फसल है। बहुत कम लागत में किसान किवी की फसल लगाकर जरूरी देखभाल के साथ अधिक मुनाफा कमा सकते हैं।

..तब एक रुपये में बेचते थे गोभी के 120 पौधे

IMG_4549पांचवीं पास मंगलानंद डबराल भी अपने शुरूआती दिनों में नौकरी की तलाश में बहुत भटके। उनकी यह तलाश उन्हें विदेश तक ले गई। जहां कुवैत में उन्होंने 1968 से 1975 तक एक कंपनी में बतौर वाहन चालक काम किया। लेकिन इसके बाद वे अपने गांव लौट आए। इसके बाद गांव में खेतीबाड़ी शुरू की तो उसी में रम गए। उस जमाने में गोभी जैसी आम सब्जी भी पहाड़ में शादी-विवाह या किसी खास मौके पर ही देखने को मिलती थी। तब मंगलानंद ने अपने गांव में ही गोभी उत्पादन कर सब्जी उत्पादन की शुरूआत की है। बकौल मंगलानंद, मैंने जब अपने खेत में गोभी उगाई तो दूसरे किसानों को आश्चर्य हुआ। तब मैंने जम्मू-कश्मीर से इसका बीज मंगवाकर पौध तैयार की। उस जमाने में एक रुपये में 120 पौधे बेचता था। तब मैंने एक सीजन में 8 हजार तक की केवल पौध ही बेची। इसके अलावा लोगों को घर-घर जाकर इसके लिए क्यारियां तैयार करवाना और पौध लगाने के साथ इसकी देखभाल के गुर बताए।

एग्जॉटिक वेजिटेबल में भी खूब अजमाया हाथ

IMG_4548पिछले दिनों मंगलानंद तब चर्चा में आए, जब उन्होंने एग्जॉटिक वेजिटेबल (विदेशी सब्जियां) का बड़े पैमाने पर उत्पादन कर जीबी पंत कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ध्यान खिंचा। संस्थान द्वारा इस काम के लिए उन्हें विशेष तौर पर सम्मानित किया गया। आज मंगलानंद एग्जॉटिक वेजिटेबल के क्रम में लैटीयूज, ब्रोकली, आइस बर्ग, जॉरसले, चाइनिज गोभी आदि सब्जियां बहुआयात में उगा रहे हैं। मंगलानंद सब्जियों का उत्पादन बाग-बगीचों के अलावा दो बड़े पॉलीहाउस में करते हैं। इसके अलावा 80 नाली और 30 नाली के दो बड़े बागों में उन्होंने करीब 15 सौ से अधिक फलदार वृक्ष लगाए हैं।

प्रोसेसिंग के लिए अपनी यूनिट

kivi1मंगलानंद के तीन बेटे हैं, रमेश, रोशन और रामकृष्ण डबराल। अच्छी बात यह है कि उनके तीनों बेटों ने पिता की राह पर चलते हुए खेती-किसानी के काम को तवज्जो दी। आज तीनों बेटे और उनका परिवार सामूहिक रूप से खेती के काम में लगे हैं। तीनों बेटे मिलकर सब्जी उत्पादन के साथ बागवानी और खुद की प्रोसेसिंग यूनिट चलाते हैं। जिससे फलों के अधिक उत्पादन की दिशा में उन्हें प्रोसेस कर जूस, जैम, अचार और दूसरे उत्पादों में बदल दिया जाता है। इसकी मार्केटिंग भी वह खुद करते हैं। उनके उत्पाद गढ़वाल-कुमाऊं के अलावा दिल्ली-मुबई और दूसरे बड़े शहरों तक पहुंचते हैं।

फूल थे पहला प्यार, आज भी बरकरार

मंगलानंद के घर के आंगन में घुसते ही पहली नजर में किसी आश्रम में प्रवेश करने का आभास होता है। वजह, चारों तरफ सुंदर फूल और दूसरे पौधों से सजीं सुंदर क्यारियां आपका स्वागत करती हैं। मंगलानंद बताते हैं, उन्हें शुरू से फूलों से बेहद प्रेम रहा है। आज यही फूल उनके व्यावसाय का प्रमुख हिस्सा हैं। गुलदावरी, लिलियम, गेंदा, ग्लेडियस, गुलाब, जरबेरा इत्यादि फूलों का उत्पादन कर वे अच्छी कमाई के साथ अन्य किसानों को भी खुशहाली संदेश देते हैं।

सरकार की प्राथमिकता में हो किसानः मंगलानंद

आज लोग पैसे और प्रापर्टी के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन वह दिन दूर नहीं है, जब लोग अन्न और पानी के लिए लड़ेंगे। खेती खत्म हो रही है और अनाज की डिमांड लगातार बढ़ रही है। कैसे होगी पूर्ति? देश में किसान आज भी हाशिए पर है। जबकि विदेशों में किसान को प्राथमिकता में रखा जाता है। उसे वहां वहीं सम्मान मिलता है, जो एक बड़े बिजनेसमैन और डाक्टर-इंजीनियर को। बकौल मंगलानंद, हमारे प्रदेश में पलायन-पलायन तो सब चिल्ला रहे हैं, लेकिन जमीन पर काम करने को कोई तैयार नहीं है। यहां की माटी में वह सब कुछ है, जो आपको भरपूर रोजगार दे सकती है। लेकिन लोग मेहनत नहीं करना चाहते। आज के युवा 10-15 हजार की नौकरी के लिए बड़े शहरों में होटल में बर्तन मांजने को तो तैयार हैं, लेकिन अपनी माटी से जुड़कर काम नहीं करना चाहते हैं। अधखिचरी पढ़ाई उन्हें पहाड़ से दूर ले जा रही है। दूसरी बात, बहुत से लोग दूसरे शहरों और कस्बों में जा बसे हैं। गांव में उनकी खेती बंजर पड़ी है। उसमें जंगल उग आया है। इससे गांव में रहकर खेती कर रहे दूसरे किसानों को दिक्कत हो रही है। बंजर पड़े खेतों में उग आई खरपतवार के कारण गांवों में जंगली जानवरों का प्रकोप बढ़ गया है। सरकार को चाहिए कि वे अपनी नीति में किसानों को प्राथमिकता में रखे। प्रदेश में चकबंदी लागू की जाए। इसके अलावा जो लोग अपनी खेती बंजर छोड़ गए हैं, उसकी खेती को पट्टे पर गांव में खेती कर रहे दूसरे किसानों को दिया जाए। ताकि खेत आबाद रहें और अजान की पैदावार होती रही।

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(नोटः यह आर्टिकल अमर उजाला से साभार लिया गया है। मकसद यही है एक अच्छी खबर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे। इसके लिए हम वरिष्ठ पत्रकार श्री विनोद मुसान जी और अमर उजाला का धन्यवाद अर्पित करते हैं। ….टीम उत्तरांजन)

4 COMMENTS

  1. खुशी होती है ऐसे लोगों की हिम्मत देख कर । यही लोग है जो इतिहास रचते है । उम्मीद है ऐसे लोगों की वजह से ही हमारे पहाड़ औऱ हमारी पहचान जीवित रहेगी ।

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