पीएम मोदी जी, कृपया ध्यान दें… यहां प्रधान के घर में तक शौचालय नहीं….

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वरिष्ठ पत्रकार विनोद मुसान की वाल से साभार

पलायन एक चिंतनः हिमालय दिग्दर्शन यात्रा-दो
दूसरा दिन : (दिनांक 23 अक्टूबर 18)

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देवजानी से केदारकांठा होते हुए दुंदा बुग्याल टीम लीडर के आदेशानुसार सभी सदस्य 6 बजे बिस्तर छोड़कर नित्यकर्म के लिए फारिक होने जंगल की ओर निकल चुके हैं। जब हम चांद पर बस्तियां बसाने की बात कर रहे हैं, ऐसे में नित्यकर्म के लिए जंगल की ओर जाने की बात सुनकर आपको थोड़ अजीब लग सकता है। लेकिन यही यहां की हकीकत है। फेसबुक और मीडिया में हमेशा छाए रहने वाले उत्तरकाशी जिले के युवा जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान जी थोड़ा गौर फरमाएं। आप ही की रिपोर्ट पर केंद्र सरकार ने  जिले को खुले में शौच मुक्त घोषित किया था। ये तो हमारी यात्रा का पहला पड़ाव है, अभी आपको दूसरे गांवों की आंखों देखी भी बताएंगे। देवजानी और ठीक इसी से लगता जिवाणु गांव दोनों में करीब तीन सौ से अधिक की आबादी निवास करती है, लेकिन यहां तीन शौचालय भी नहीं हैं। जिन नालों-धारों के इर्द-गिर्द बैठकर लोग शौच करते हैं, उन्हीं का पानी पीने के लिए भी प्रयोग करते हैं। यहां अस्पताल तो नहीं हैं, लेकिन बीमारियों के घर तक पहुंचने का पूरा इंतजाम है। …और तो और ग्राम प्रधान के घर पर भी यह व्यवस्था नहीं है। बिजली है, लेकिन उसकी रोशनी मोमबत्ती से भी मंद है। पीने के पानी के लिए आज भी धारों का सहारा है। नित्यकर्म से निपटने के बाद नहाने की तो यहां कोई सोच भी नहीं रहा है। यात्री दल के सदस्यों का कहना है कि अगले पांच दिन तक तो भूल ही जाओ।

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खैर, मुंह-हाथ धोकर नाश्ते की तैयारी है। अब तक धूप भी निकल आई है। खुले बरामदे में नाश्ता सज चुका है। राई की सब्जी और घी के साथ मंडुवे की रोटी ने शरीर में पूरे दिन के लिए ऊर्जा स्टोर कर ली है। अब यात्रा दल के कुछ सदस्य गांव में स्थित मंदिर में दर्शन करने चले गए हैं। बताया जाता है कि यह पांडवों की भूमि है। कुंती पुत्र कर्ण ने इस भूमि को जीता था। तब उनका महासू देवता के साथ युद्ध हुआ था। उन्होंने उस वक्त अपने प्रताप से रेत-पत्थरों को सोने में बदल दिया था। खैर ये ऐतिहासिक तथ्य हैं, इन पर ज्यादा बात नहीं करना चाहूंगा। गांव वालों से सुनी-सुनाई 
बातें हैं, इनका कोई प्रमाणिक आधार मेरे पास नहीं है।
हमारी यात्रा के अंतिम पड़ाव सर बड़ियार पट्टी के धिंगाड़ी गांव से दो स्थानीय गाइड कैलाश और राकेश देवजानी पहुंच चुके हैं। जो अब आगे की यात्रा में हमारा पथ प्रदर्शन करेंगे। भारी सामान के लिए दो खच्चरों की व्यवस्था भी की गई है। स्थानीय युवक हरिओम चौहान और कुछ स्थानीय लोग भी हमारे साथ यात्रा पर चलने की तैयारी कर रहे हैं। अब देवजानी छोड़ने का समय आ गया है। यात्री दल पगडंडीनुमा रास्ते पर आगे बढ़ चुका है। गांव की शुरूआत से ही खड़ी चढ़ाई शुरू हो चुकी है। लेकिन अभी नाश्ते की ताजी ऊर्जा पेट से होते हुए धमनियों में पहुंच चुकी है। आमतौर पर लोग केदारकांठा सांकरी होते हुए पहुंचते हैं। लेकिन हम यहां नए ट्रेकिंग रूट की तलाश में आये थे, ताकि इस घाटी के लोग भी पर्यटन गतिविधियों से जुड़ सकें। चूंकि ये चिह्नित ट्रैक नहीं है। इसलिए यहां कदम-कदम पर दुश्वारियां हैं।

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रास्ते हैं, लेकिन घोड़े-खच्चरों और भेड़-बकरियों के खुरों ने ही इन्हें निशान दिए हैं। मतलब इन रास्तों पर मानव पथ संचलन कम ही होता है। अगर भविष्य में यह रूट केदारकांठा के लिए चिह्नित होता है तो यह हमारी यात्रा की बड़ी कामयाबी होगी। रास्ते में हम सुंदर बुग्याल, सदाबहार जंगल और झरने पीछे छोड़ते जा रहे हैं। रास्ते में कुलाका बुग्याल (स्थानीय बोली में इन्हें थाज कहा जाता है), एरणी बुग्याल, तालका बुग्याल वे रमणीक स्थल हैं, जहां इस रूट पर केदारकांठा जाते हुए कैंपिंग की जा सकती है। कुलाका व एरणी बुग्याल जहां जंगलों के बीच केदारगाड़ के किनारे स्थित हैं, वहीं तालका बुग्याल केदारकांठा के बेहद निकट का बुग्याल है। यहां चरवाहों की पत्थरों से बनी सुंदर छानियां भी आकर्षित करती हैं। इसके अलावा इस क्षेत्र में जौटा, लमड़िका, पत्थरफोड़ थाच में भी कैंपिंग की जा सकती है। लेकिन हमारा दल इन स्थलों में से कहीं भी रूकने वाला नहीं था। रूट प्लान के मुताबिक हम केदारकांठा टॉप (करीब 10 किमी)को पार करते हुए दुंदा बुग्याल के भेड़ालों के लिए चिहिंत स्थलों में रात्रि विश्राम करने वाले थे। देवजानी से यहां तक की कुल दूरी करीब 12 से 14 किमी थी। सुबह नौ बजे के चले शाम करीब छह बजे 10 किमी का सफर तय कर हम केदारकांठा क्षेत्र में थे।

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इससे पहले रास्ते में हुई हल्की बर्फबारी की फुहारों ने हमारा स्वागत किया। दस हजार फीट की ऊंचाई पर पहुंचते ही जंगल पीछे छूट चुके थे। बुग्याल क्षेत्र शुरू होते ही ऑक्सीजन की कमी भी महसूस होने लगी थी। चढ़ाई पर एक-एक कदम दस कदमों के समान लग रहे थे। इतनी ऊंचाई पर कम ऑक्सीजन के साथ चढ़ाई कराना, वाकई मुश्किल काम था। अकसर दूर से सुंदर दिखाई देने वाले बुग्याल बताते हैं कि हम यूं ही अतुलनीय नहीं है। हम बर्फीली हवाओं के बीच पैदा होते हैं और साल के छह माह से अधिक समय तक इसी बर्फ में दफन रहते हैं। हमारी प्रकृति का अलग 
मिजाज है। हम अनोखे हैं, इसलिए हम खास हैं।

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इस ऊंचाई पर बर्फीली हवाएं होंठों और चेहरे को काट रहीं थीं। अंधेरा होने को था। कुछ साथी टॉप पर पहले पहुंच गए थे। मैं आखिर में पहुंचने वालों में था। टीम लीडर रतन सिंह असवाल के आदेशानुसार जब तक सभी साथी टॉप पर नहीं पहुंच जाते, दल आगे नहीं बढ़ सकता था। हम सुव्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ रहे थे। एक स्थानीय गाइड दल के सबसे आगे एक बीच में और एक आखिर में चल रहा था। ताकि कोई साथी पीछे छूट जाए तो रास्ता न भटक जाए। सभी साथियों के टॉप पर पहुंचने के बाद यहां स्थित मंदिर में फोटो सेशन कराया। सेल्फी का दौर चला और हम आगे बढ़ चले। रात्रि विश्राम स्थल तक पहुंचने के लिए अभी कितना सफर और तय करना है, इसकी किसी को 
जानकारी नहीं थी। हां स्थानीय गाइडों के अनुसार बस थोड़ी और…. बस थोड़ी और…. की ही दूरी बची थी। वे हवा में दूरी को नापते हैं, इसका अब तक हमें अंदाजा हो चुका था। अगर वो कहें कि आधा किमी बचा है तो समझ लो, अभी दो किमी और चलना है। धैर्य बना रहे और पथिक निराश न हों, उनकी यह हवाई दूरी बताने की एक वजह यह भी हो सकती है। खैर,चंद्रमा सबाब पर था और हम धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे। बाईं तरफ खड़ी चट्टान, दाईं तरफ कई किमी गहरी खाई और बीच में पगडंडीनुमा रास्ता। इंच भर गलती की भी कोई गुंजाइश नहीं। जैसे-तैसे करीब डेढ़ किमी का ये रास्ता तय किया। अब आगे खुले मैदान सा बुग्याल क्षेत्र था। लेकिन मंजिल कितनी दूर है, अभी ठीक-ठीक किसी को पता नहीं था। होते करते मैं सबसे पीछे छूट गया। पिछले दो माह से कमर के दर्द से जूझ रहा था, बावजूद इसके यात्रा पर चला आया। 

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अब मुझे अपने इस निर्णय पर घोर निराशा हो रही थी। लेकिन स्थानीय गाइड हरिओम और साथी सुनील कंडवाल बराबर मेरे साथ चल रहे थे। वे मेरी हिम्मत बढ़ा रहे थे। …अब मैं तिल-तिल आगे कदम बढ़ा रहा था। कौन सा पैर कहां पड़ रहा है, पता हीं नहीं चल रहा था। इसी बीच दूर से एक रोशनी अपनी तरफ आती दिखाई दी। पता चला एक अन्य स्थानीय गाइड हमें ढूंढते हुए आ रहा था। उसी से पता चला कि हम अपने पड़ाव से मात्र एक किमी दूर हैं…. 
मतलब अभी हमें दो किमी और चलना था। खैर पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं था। न ही कोई ठहराव। न पेड़ न कोई पठार। जहां आप सिर भी छुपा सको। जैसे-तैसे आगे बढ़े तो मधिम रोशनी की एक किरण ने फिर से उमंग जगा दी। लगा अब तो कैंप पहुंच ही गए। पास गए तो अपने कुछ साथियों का शोर भी सुनाई दिया। सभी ने तालियां बजाकर मेरा स्वागत किया। आग जल रही थी और इनके हाथ में चाय के गिलास थे। अब मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। लेकिन कुछ ही देर में ये खुशी काफूर हो गई। पता चला ये हमारा कैंप नहीं था। इस छानी क्षेत्र में दूसरा पर्यटक दल ठहरा था। हमारी मंजिल अभी और दूर थी। मरता क्या न करता… वाली स्थिति में चाय की चुस्कियां लेने के बाद अन्य साथियों के साथ फिर डग भर लिए। करीब आधा घंटा चलने के बाद अपना कैंप दिखाई दिया। दूसरे साथी चांदनी रात में सुस्ता रहा थे। चेहरे पर थकान, लेकिन पहला पड़ाव पार करने की खुशी भी साफ झलक रही थी। पोटर्ल अब तक आग जला चुके थे और चाय की केतली चूल्हे पर चढ़ चुकी थी। इधर, निढाल हालत में गिरता-पड़ता मैं भी कैंप में पहुंचा तो अन्य साथियों ने फिर से तालियां बजाकर इस्तकबाल किया। पैदल चलने के बाद जब तक शरीर में गरमाहट थी, तब तक तो ठीक था, लेकिन कुछ देर सुस्ताने के बाद बर्फीली हवाएं चेहरे को काटने लगीं। तुरंत पत्नी कृष्णा का चेहरा याद आया…. मेरे ना-ना करने के बावजूद उसने बैग में एक गर्म ऊनी शॉल रख दी थी। अब उसी का सहारा था। थैक्स कृष्णा… तुम वाकही कमाल हो। मुझे पता नहीं होता, मुझे कब किस चीज की जरूरत पड़ेगी, लेकिन तुम दूर रहते हुए भी ये सब खूब जानती हो। अब हम चांदनी रात में फोल्डिंग कुर्सियों का घेरा बनाकर बीच में जलती आग से खुद को गर्म करने की जुगत कर रहे थे। चारों तरफ बर्फ से घिरे पर्वतों के बीच यह आग ही थी, जो इस वक्त मां के आंचल सा अहसास करा रही थी। गपशप का दौर शुरू हुआ तो छोटे-बड़े सभी साथी उसमें शामिल हो गए। चाय के साथ पकोड़ों का दौर शुरू हुआ तो पोर्टेबल स्पीकर पर मधुर संगीत की स्वर लहरियां भी बज उठीं। कभी पहाड़ तो कभी कुमाऊंनी और फिर जौनसार संगीत ने माहौल में रंग घोल दिया। देर तक नाचने-गाने का कार्यक्रम चलता रहा। अब तो थकान जैसे कोसों दूर भाग गई थी। तभी स्थानीय पोर्टल साथियों ने गरमा-गरम भोजन तैयार होने की सूचना दी। सुबह के नाश्ते के बाद हम दोपहर में भोजन नहीं कर पाए थे। साथ लाए ड्राई फ्रट‍्स, चने, बिस्कुट और टोफियों से काम चला लिया था। भूख अब पेट में हेलोरे मार रही थी। तुरंत सब खाने की टेबल पर पहुंचे और शुरू हो गए। खाना खाने के बाद सभी साथी छानियों में घुसकर अपने-अपने स्लिपिंग बैग में घुस गए …. और धीरे-धीरे नींद के आवोश में समा  गए……!!!!
जारी…..

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