यहां रास्ते में चलते हुए पथिक को आवाजें देतीं हैं आच्छरियां…!!!

    वरिष्ठ पत्रकार विनोद मुसान की कलम से.....

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    पलायन एक चिंतनः हिमालय दिग्दर्शन यात्रा-चार
    चौथा दिन : (दिनांक 25 अक्टूबर 18)
    तलहटी से सर बड़ियार
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    आज वह सबकुछ हुआ, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। एक के बाद एक नई बातें सामने आईं। मौसम ने चौंकाया तो रस्तों ने रूलाया, साथियों ने मरहम लगाया तो पीछे से किसी आछरी ने आवाज दी सुनो…. सुनो…. और भी बहुत कुछ। क्या कुछ हुआ आज हमारे साथ जानने के लिए आइये चलते हैं आगे की यात्रा पर….

    अन्य दिनों की अपेक्षा दल के सदस्य आज जल्दी बिस्तर छोड़ चुके थे। शायद आज मेरी ही तरह दूसरे लोगों को भी अच्छी नींद आई। थकान का असर भी था। ठंड यहां भी चरम पर थी। लेकिन इस बीच पोर्टल गर्म पानी की व्यवस्था में लगे थे। सबने अपनी बोलतों में पानी लेकर सबसे पहले गला तर किया। इस हाइट पर आपको पानी की आवश्यकता महसूस नहीं होती, लेकिन, डिहाईड्रेशन से बचने के लिए जरूरी है कि आप समय-समय पर पानी पीते रहे हैं। रात साथी इन्द्र सिंह नेगी, तनुजा जोशी की तबियत कुछ खराब होने की खबर मिली। शायद डिहाइड्रेशन की वजह से ही ऐसा हुआ। लेकिन अब वे स्वस्थ थे। तनुजा जोशी मेरी ही तरह कमर के दर्द से कुछ परेशान थीं, लेकिन इंद्र सिंह नेगी की तबियत खराब होना हैरान करने वाला था। ये हमारे दल के सबसे फिट साथी थे। जो पर्वतों को को किसी वानर की भांति नाप रहे थे।

    तलहटी वह स्थान है, जहां से सरुताल की यात्रा शुरू की जाती है। यहीं आकार सारे रास्ते मिलते हैं। आप चाहे पुरोला से सर गांव होकर पहुंचे या सांकरी से जुड़ा का तालाब, केदारकांठा, बनियाथाच, दुंदा थाच, पुस्तारा बुग्याल या फिर देवजानी से। सरुताल का सफर यहीं से शुरू होता है। जैसे हमारा सफर देवजानी से शुरू हुआ था। यहां चहुंओर प्रकृति की अनुपम छटाएं देखने को मिलती हैं। सुंदर बुग्यालों में अनेकों औषधियों जड़ी-बुटियों की यहां भरमार है। लेकिन इस दिनों बर्फबारी से पहले बुग्याल अपना रंग बदल बदले देते हैं। फूल भी मुरझाकर लुप्त हो जाते हैं। उगते सूरज के साथ बुग्यालों का अलग ही रंग देखने को मिलता है। यहां भी हमें दिशा का ठीक-ठीक अंदाजा नहीं हो पाया कि सूरज किस ओर से निकलेगा। सबसे पहले सूरज की किरणें हिमालय के दमकते माथे पर ही पड़ीं। जैसे-जैसे सूरज चढ़ा पहले सुर्ख लाल हुआ, फिर स्वर्णिम और अंत में चांदी सा चमकने लगा। दल के सभी सदस्य कैमरों में इन दृश्यों को कैद करने में व्यस्त थे तो पोर्टल नाश्ते की व्यवस्था में लगे थे।

    अब हम सरुताल की चढ़ाई चढ़ने वाले थे। लेकिन तभी स्थानीय गाइड ने ऊपर चोटी पर मौसम खराब होने की खबर दी। तय हुआ कि दल के युवा सदस्य ही चोटी पर चढ़ेंगे, बाकि बैस कैंप में ही रहेंगे। लेकिन इस बात पर भी सदस्यों में दो राय निकल कर आई। अकेले कुछ साथियों को चोटी पर भेजना ठीक नहीं होगा। दूसरा यहां संपर्क का कोई साधान मौजूद नहीं है। रास्ता बेहद खतरनाक है और रॉक क्लाइबिंग के उपकरण भी नहीं हैं। बहुत देर विचार-विमार्श के बाद तय किया गया कि सरुताल का कार्यक्रम रद्द किया जाए। लेकिन आज के दिन का उपयोग आगे का रास्ता तय कर किया जाए। टीम लीडर रतन सिंह असवाल ने बताया कि यहां ने निकलकर हम करीब 6 किमी की दूरी पर स्थित डोबलका नामक थाच (बुग्याल) में कैंप करेंगे।

    डोबलका बुग्याल की बात सामने आने के बाद पोर्टलों को बुलाया गया। लेकिन उन्होंने अमूक स्थान पर पानी न होने की बात कहकर वहां जाने से साफ मना कर दिया। दूसरी समस्या खचरों के लिए उपयुक्त रास्ता न होने की सामने आई। इसके बाद तय किया गया कि एक गाइड को रैकी के लिए पहले उक्त स्थान पर भेजा जाए। अगर वहां पानी मिला तो ठीक नहीं तो सभी सदस्य उसके अगले पड़ाव सर गांव में निवास करेंगे। इसमें भी दो समस्याएं थीं। पहली यह कि तलहटी से सर गांव की दूरी करीब 20 किलीमीटर थी और दूसरी यह कि सर गांव में रूकने का पूर्व निर्धारित कोई कार्यक्रम नहीं था। इसलिए रहने खाने की समस्या सामने आ सकती थी। एक तरह से हिमालय के इस तलहटी नामक स्थान पर पूरा दल असमंजस की स्थिति में था कि आखिर क्या किया जाए। वक्त तेजी से आगे बढ़ रहा था। यहां एक-एक मिनट की कीमत थी।

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    लेकिन टीम लीडर रतन सिंह असवाल ऐसे नाजुक मौकों पर तेजी से निर्णय लेने के लिए ही जाने जाते हैं। उन्होंने पोर्टलों को खच्चर तैयार करने का आदेश सुनाया। इस आशय के साथ कि यदि खच्चर पहाड़ी से नहीं उतर पाए, तो वे लौट आएं। आगे हम अपनी जिम्मेदारी पर सफर तय करेंगे। राकेश नामक गाइड रैकी के लिए निकल चुका था। हम सबके बैग आगे की यात्रा के लिए तैयार
    थे। नाश्ता टेबिल पर लग चुका था। मैं आज टीम को लीड करना चाहता था, इसलिए नाश्ते से सबसे पहले फारिक हो गया। जिस रास्ते से हम आए थे, सर बड़ियार जाने के लिए करीब 4 किमी वापस उसी रास्ते पर चलना था। इसलिए मैं और सीआईएसएफ में इंस्पेक्टर मेरा दोस्त सुनील कंडवाल दल के अन्य सदस्यों से करीब 15 मिनट पहले कैंप से निकल गए। जिस रास्ते से आए वापस उसी रास्ते में चलने पर कोफ्त हो रही थी, लेकिन दूसरा कोई रास्ता भी नहीं था। इस वक्त हम बुग्यालों पर खड़ी चढ़ाई चढ़ रहे थे। कमर का दर्द आज ठीक था। मतलब मैं आज पहले से बेहतर महसूस कर रहा था। इसलिए तेजी से कदम आगे बढ़ रहे थे। अब हम दो किलीमीटर की चढ़ाई चढ़ चुके थे, तब भी हमारा कैंप दिखाई दे रहा था। दल के अन्य सदस्यों ने अब चलना
    शुरू कर दिया था।
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    तीन किलोमीटर चलने के बाद रास्ते में ग्लेश्यिर से भरा वही दर्दा फिर सामने आ गया, जिसे आते वक्त अन्य साथियों ने नीचे घाटी में उरकर पार किया था और मैंने गाइड के साथ करीब आधा किमी की अतिरिक्त चढ़ाई चढ़कर उसके शीर्ष से नापा था। लेकिन इस बार मैंने भी घाटी में उतरकर इस दर्दे का पार करने का एलान कर दिया । रास्ता बेहद खतरनाक था, लेकिन मैं ठान चुका था, मैं भी इसी रास्ते से वापस जाऊंगा। दर्दा पार करते हुए सामने पथरीली खड़ी चट्टान थी, जिस पर चढ़ना काफी खतरनाक था। सुनील पहले चढ़ चुका था। अब मेरी बारी थी। मैंने बेहद सावधानीपूर्वक इस मिशन को पार किया। एक अलग तरह की खुशी अपने अंदर महसूस की और आगे बढ़ गया। लीड करने का मतलब होता है, आपको सबसे आगे चलना है। इसलिए रूकना मेरे लिए संभव नहीं था। मैं धीरे कदमों से लगातार आगे बढ़ रहा था। अब मैं सुनील और गाइड कैलाश उस स्थान पर पहुंच गए थे, जहां से हमें डोबलका के लिए अलग रास्ता चुनना था। तय किया कि रूककर अन्य साथियों का यहीं इंतजार किया जाए। इतनी देर में दूसरा गाइड राकेश भी रैकी कर उक्त स्थान पर पहुंच चुका था।

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    इधर, पीछे आ रहे दूसरे साथी भी पहुंच चुके थे। राकेश ने बताया कि डोबलका में कोई बहता पानी नहीं है। एक स्रोत है, जिसमें मात्र दस लीटर पानी होगा। मतलब साफ था हम चाहते हुए भी वहां नहीं रूक सकते थे। खैर मौके पर जाकर स्थिति देखने की बात तय हुई और हम आगे
    बढ़ चले। कुछ आगे बढ़े तो यहां जन्नत हमारा इंतजार कर ही थी। हिमालय के शीर्ष पर मैंने इतना बड़ा बुग्याल पहले कभी नहीं देखा था। दूर तक बुग्यालों की छटा देखते ही बन रही थी। सामने हिमालय की पर्वत श्रंखला दूर तक फैली थी। एक स्थान से स्वर्गाराहिणी, बंदरपूंछ,
    चौखंबा, भराड़सरताल, हरकी दून, काली नाग शिखर, चांगशील पर्वत के दर्शन हो रहे थे। लेकिन इस स्थान के दूसरी तरफ एक अलग ही दुनिया थी। दूर तक पहाड़ों की घाटियां दिखाई दे रहीं थी। चूंकि हम शीर्ष पर थे, इसलिए दूर तक फैली पर्वत श्रृंखलाएं छोटी नजर आ रहीं थीं। इसे आप ऐसे देख सकते हैं, जैसे आप हवाई जहाज में सफर करते हुए पर्वत श्रृंखलाओं को देखते हैं। अब तक हमने इन पर्वतों में उतार-चढ़ाव ही देखा था, लेकिन अब हम जो देखने जा रहे थे। वह बहुत डरावना था….

    ठीक इसी स्थान से आगे बढ़कर अब हमें सीधी खड़ी एक चट्टान से नीचे उतरना था। जो करीब 500 मीटर थी। ऐसा लग रहा था मानो एक बहता झरना अचानक गिरना बंद हो गया है और अब हमें इस पार करना है। पत्थरों पर पांव जमाकर संभलते हुए हम आगे बढ़े। 500 मीटर की यह दूरी हमने करीब आधे घंटे में पार की। इसके बाद एक पगडंडीनुमा रास्ता था। एक तरफ चट्टान और दूसरी तरफ खाई। कुछ दूरी पर रास्ता भूस्खलन के कारण पूरी तरह गायब था। मतलब साफ था नीचे खाई में उतरकर वापस पगडंडीनुमा रास्ते में पहुंचना था। जो भी साथी इस रास्ते को पार कर जाता, सामने पहाड़ी पर बैठकर अन्य साथियों के आने का इंतजार करता। कुछ देर बार
    दल के सभी सदस्यों ने ये कठिन रास्ता भी पार कर लिया। अब बारी थी, उन दो खच्चरों की जो हमारे बैग लेकर साथ चल रहे थे। देवजानी से हमारे साथ चल रहे खच्चर वाले दो लोगों ने भी हिम्मत दिखाई। पहले हमारे बैग अपनी पीठ पर लादकर नीचे पहुंचाए, फिर बमुश्किल खच्चरों को नीचे उतारा। खाने-पीने और अन्य दूसरी जरूरी चीजें लेकर हमारे साथ चल रहे छह अन्य खच्चरों के मालिकों ने इस रास्ते से खच्चर उतारने में हाथ खड़े कर दिए। …और वे वहीं से लौट गए।

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    अब तय हो चुका था कि हमारा अगला पड़ाव सर बड़ियार होगा। जो यहां से करीब 12 किमी दूर था। अब तक हम करीब 8 किमी का सफर तय कर चुके थे। तय किया गया कि एक स्थानीय गाइड को पहले भेजकर गांव में रहने-खाने की व्यवस्था की जाएगी। इस काम के लिए कैलाश को चुना गया। कैलाश सर बड़ियार से दो किमी आगे धिंगाड़ी का रहने वाला था। इसलिए वह इस
    व्यवस्था को अच्छे से निभा सकता था। अब हमारे साथ एक धिंगाड़ी का ही रहने वाला गाइड राकेश, देवजानी से हमारे साथ चला हरिओम और एक बुर्जग सज्जन (नाम याद नहीं) रह गए थे।
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    अब बुग्याल क्षेत्र समाप्त हो गया था। यहां से ट्री लाइन शुरू हो गई थी। अब केवल उतराई वाला जंगल का रास्ता था। यहां खिर्सु, देवदार के सदाबहार घने जंगल थे। दल आगे बढ़ चुका था। साथ ही मेरी कमर का दर्द भी अब तेज हो गया था। पेनकिलर खाने के बाद भी दर्द से
    राहत नहीं मिल रही थी। अब चलना मुश्किल हो रहा था। लेकिन चलना मजबूरी था। इससे पहले टीम लीडर रतन सिंह असवाल ने मुझसे पूछा भी खच्चर ले लो। लेकिन मैं अपनी इस यात्रा को अपने पैरों के बूते ही पूरा करना चाहता था। जंगल के बीच पहाड़ी से उतरते हुए तेज ढलान में घुटने जवाब देने की स्थिति में पहुंच चुके थे। अब तक युवा साथी सिद्धार्थ रावत, जितेश, प्रणेश असवाल, सौरभ असवाल, सुनील कंडवाल और गाइड राकेश मेरे साथ थे। बाकि सदस्य आगे बढ़ चुके थे। रास्ता था कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। राकेश हर मोड़ पर कहता अब पहुंचने ही वाले हैं। कुछ देर बार अन्य साथी भी आगे निकल गए। मेरे साथ सुनील और राकेश ही रह गए। राकेश की मजबूरी ये थी कि उसे आगे चल रही टीम को रास्ता भी दिखाना था। केवल वही एक शख्स था जिसे इस रास्ते का पता था। क्योंकि जंगल के बीच में गुर्जरों और भेड़ वालों के कई और रास्ते भी थी। जिनमें कोई भी भटक सकता था।

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    हमने कितनी दूरी नाप ली है, इसका ठीक-ठीक अंदाजा नहीं लग पा रहा था। शाम करीब चार बजे का समय होगा जब जंगल के बीच में एक छोटे बुग्याल में दल के अन्य सदस्य बैठे नजर आए। मेरे दोनों पैरों में अब तक छाले निकल आए थे। मैं बमुश्किल यहां तक पहुंचा था। सब खाने पर मेरा और सुनील का इंतजार कर रहे। पुलाव और अचार कैंप से ही बनाकर टीम साथ चली
    थी। मेरे पहुंचने से पहले टीम करीब आधा घंटा यहां आराम कर चुकी थी। मैंने अन्य साथियों के साथ हल्का भोजन किया। इसके बाद मुझे फिर से खच्चर पर बैठकर चलने का ऑफर दिया गया। लेकिन पता नहीं वो कौन सी शक्ति थी जो पूरा शरीर टूटने के बाद भी मुझे ऐसा करने से रोक रही थी। दूसरा, मैंने सोचा दो ही खच्चर हैं, अगर मैं एक में बैठ गया था, उसमें लदा सामान अन्य साथियों की पीठ पर आ जाएगा। वो भी तो मेरी ही तरह थके हैं। मैं ऐसा बिल्कुल नहीं चाहता था। आखिरकार तय हुआ कि गाइड टीम के साथ आगे चलकर रास्ता बताएगा और मैं और सुनील धीरे-धीरे पीछे आएंगे। एक नीश्चित दूरी पर एक मंदिर था जहां तक हमें पहुंचना था।
    यहां राकेश हमारा इंतजार करेगा।
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    दल आगे बढ़ चुका था। मैं और सुनील बातें करते हुए आगे बढ़ रहे थे। अब अंधेरा भी सिर पर था। बहुत जल्दी सूरज डूबने वाला था। जंगल में तो वैसे ही अंधेरा जल्दी हो जाता है। हम मंदिर तक पहुंचते उससे पहले राकेश हमें रास्ते में बैठा दिख गया। पता चला राकेश दल को करीब एक किमी आगे छोड़ रास्ता बताकर वापस आया है। इसका पता हमें तब चला जब हम निश्चित दूरी तक
    करने के बाद उसने अपना बैग दिखाया। ऐसी कर्मठता एक ठेठ पहाड़ी ही दिखा सकता है। राकेश को इस क्षेत्र का टारजन कहा जाए तो गलत नहीं होगा। उसके अनुसार अपने गांव धींगाड़ी से और सरुताल करीब 30 किमी की खड़ी चढ़ाई वो सुबह से शाम तक आसानी से नाप सकता है। जबकि किसी भी आम आदमी के लिए यह असंभव बात है। खैर इस बीच हम राकेश और उसके परिवार, उसकी जिंदगी भविष्य की योजनाओं के बारे में बात करते हुए चल रहे हैं। उसकी कहानी बताऊंगा तो ये
    कहानी बहुत लंबी हो जाएगी। इसलिए हम अपने रास्ते पर आगे बढ़ते हैं।

    इस बीच मैं कई बार अपने घुटनों और कमर पर स्प्रे मार चुका था। पूछने पर राकेश बार-बार वही हवाई दूरी बताता बस आधा किमी और…. हम पहुंचने ही वाले हैं। जबकि अब तक दूर-दूर तक बस्ती के कहीं निशान नहीं दिखाई दे रहे थे। जंगल अब घुप्प अंधेरे में घिर चुका था। मेरे पास के एक टार्च थी, जो मुझे दलवीर रावत जी ने पहले ही दे दी थी। सुनील और राकेश मोबाइल की टार्च के सहारे चल रहे थे। इस बीच वे दोनों बातें करते हुए आगे निकल गए और मैं अकेला जंगल में पीछे छूट गया। दिमाग ने अब काम करना बंद कर दिया था। कदम कहां पड़ रहे हैं पता ही नहीं चल रहा था। जब पैर से छिटकर कर कोई पत्थर दूर तक लुढ़क जाता, तब ध्यान आता, अरे नहीं… ऐसे नहीं चलेगा… तुम्हें संभल कर चलना है विनोद… सर और धड़ निकल चुका है, अब बस पूंछ बाकि बची है। तभी किसी ने पीछे से जैसे आवाज दी.. सुनो…. सुनो… जैसे कोई लड़की आवाज दे रही हो। अछरियों (अतृप्ति आत्माएं या परियां) का ख्याल आते ही शरीर के सारे रोंगटे खड़े हो गए। खुद को बहुत समझाया नहीं… नहीं .. ऐसा कुछ नहीं हैं। यहां मुझे बाघ-भालू से डरना चाहिए… तुम ये आछरियां लेकर कहां से बैठ गए। दिल को बहुत समझाया, लेकिन डर दूर न हो पाया।

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    तभी मैंने जोर-जोर से सुनील और राकेश को आवाज लगानी शुरू कर दी। वे मेरी तरफ भागते हुए लौट कर आए। मैंने बोलो- सुनील तुम जहां खड़े हो, वहीं रुको और सुनो…. क्या तुम्हें भी ये आवाज सुनाई दे रही है। देखों इस घने जंगल में कोई लड़की हमें पुकार रही है। लेकिन सुनील ने मेरी बात को मजाक में लिया। राकेश बोला, सर जी कोई पक्षी होगा। मैंने भी इस बात को ज्यादा तूल नहीं दिया। बस दोनों को हिदायत दी एक मेरे आगे और एक पीछे चलेगा।

    चलते-चलते आखिरकार जंगल से सटा सर गांव भी दिखाई दे गया। यहां बिजली के बल्ब मधम रोशनी में टिमटिमा रहे थे। दल के लोग उस घर में पहुंच चुके थे, जहां हम रात बिताने वाले थे। कैलाश ने गांव वाला को पूरी स्थिति बता दी थी। तय हुआ था कि यात्री दल के सभी लोग अलग-अलग घरों में आसरा लेंगे। खान भी अलग-अलग घरों में बन रहा था। हम उपेंद्र सिंह जयाड़ा
    जी के घर पर रूकने वाले थे। बोर्ड पर लगी नेमप्लेट से पता चला जयाड़ा जी पशुधन प्रसार अधिकारी हैं और उत्तरकाशी जिलें में ही कहीं पोस्टेड हैं। मेरी पत्नी भी पशुधन प्रसार अधिकारी हैं। लगा ये तो अपना ही घर है। खैर गांव की सीमा में पहुंचने से पहले ही कुछ ग्रामीण हमें लेने आ चुके थे। शुरूआत में ही कालिंगा नाग जी का भव्य मंदिर है। इसी मंदिर में ग्रामीणों ने दल के सदस्यों के पहुंचने पर ढोल-दमाऊ और फूल मालाओं के साथ स्वागत किया था। रतन सिंह असवाल यहां जाना-पहचाना नाम था। गांव में आज बिजली थी तो उसके कारक भी रतन सिंह असवाल ही बने थे। पूर्व में जब अपने मित्र सासंद प्रदीप टम्टा के साथ उन्होंने इस
    गांव का दौरा किया था, तब ग्रामीणों ने बिजली की समस्या से अवगत कराया था। रतन सिंह असवाल जी ने इसे एक मुहिम की तरह लिया और आखिरकार गांव तक बिजली पहुंचाकर ही दम लिया। ये बात मुझे बाद में कई ग्रामीणों के मुख से सुनने को मिली।

    गिरते-पड़ते में घर के पहले माले पर पहुंचा तो एक कुर्सी पर ढेर हो गया। तभी राकेश एक पतीले में नमक डालकर गर्म पानी ले आया। भाई Dalbir Rawat जी पैरों में आकर बैठ गए और अपने हाथ से मेरे पैर धोने लगे। मैंने बोला-भाई साहब ये आप क्या कर रहे हैं। नहीं… नहीं.. रूको मैं आपको ऐसा नहीं करने दे सकता। वे बोले- चुप बैठे रहो। बस इतना समझो तुम एक घायल मरीज हो और मैं तुम्हारा डाक्टर। दिल जीत लिया भाई साहब आपकी इस बात ने। तब नहीं कहा, लेकिन अब कह रहा हूं… मुसान ताउम्र आपका हुआ। अब तक मैं आपको एक खुदगर्ज इंसान समझ रहा था, जो किसी भी तरह ट्रेकिंग में दल को पीछे छोड़ते हुए बस आगे बने रहना चाहता था। लेकिन अब पता चला 52 साल का ये बूढ़ा नौजवान आखिरकार एक प्यारा सा बच्चा है। लव यू दलवीर भाई…. आपका बेटा सिर्द्धाथ उफ्र टोटो भी आप पर गया है। रास्ते भर में देख रहा था, हर किसी की मदद को हर समय तैयार। अपने सामान को बोझ तो उठा ही रखा था, दूसरों का सामान लेने के लिए भी हर समय तत्पर। आपका परिवार खूब फले-फूले बस इतनी सी दुआ है।

    दल के सभी सदस्य थक कर चूर हो गए थे। खाना अलग-अलग घरों से एक ही जगह पहुंचा था। मेरे लिए राकेश किसी घर से खाना लाया था। जो मैंने बिस्तर पर बैठकर ही खाया। इसके बाद तो मैं धड़ाम हो गया। अगली सुबह हम यहां से दो किमी की दूरी पर स्थित धिंगाड़ी गांव जाने वाले थे। लेकिन उससे पहले इस गांव के तमाम रहस्य उजागर हुए, जो अपने आप में अकल्पिनीय हैं। यहां का जीवन और लोक कथाएं इस छोटे से यात्रा वृतांत में समेटना संभव ही नहीं है। लेकिन
    फिर भी कुछ अनछुए पहलुओं से आपको जरूर अवगत कराऊंगा… तो जानने के लिए पढ़ते रहिए…
    मेरी यात्रा।
    © जारी….

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