इस गांव में जो कुछ देखा, कभी सोचा न था….

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    वरिष्ठ पत्रकार विनोद मुसान की कलम से…..

    #पलायन एक चिंतनः #हिमालय दिग्दर्शन यात्रा-पांच
    पांचवां दिन : (दिनांक 26 अक्टूबर 18)
    सर बड़ियार से धिंगाड़ी
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    यात्रा की पांचवीं कड़ी प्रस्तुत करने में एक दिन का विलंब हो गया। इसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूं। इसी बीच कई साथियों ने मैसेज तो कईयों ने फोन कर इसका कारण पूछा। जिससे पता चलता है कि आप लोग कितनी दिलचस्पी लेकर इस यात्रा वृतांत को पढ़ रहे हैं। थोड़ा लंबा होने की वहज से कई लोग समय नहीं निकाल पा रहे हैं, लेकिन उनके मुताबिक वे समय निकालकर इस लोक यात्रा को बाद में जरूर पढ़ेंगे। जो पढ़ रहे हैं मैं उनका आभारी हूं… जो नहीं पढ़ रहे है, सिर्फ लाइक करके आगे बढ़ जा रहे हैं… मैं उनका भी आभारी हूं।

    रात दवा खाने के बाद जिस होड़ लेटा था, सुबह उसी होड़ उठा। ये एक चैन भरी नींद थी, जो सदा नहीं आती। तीन दिन स्लिपिंग बैग में सोने के बाद आज रजाई-गद्दों का आनंद भी प्राप्त हुआ था। अब सुकून वाली सुबह सामने थी, आज का दिन आराम के लिए निर्धारित था। अलसुबह उठने के बावजूद गांव में चहल-पहल थी। लोग अपने काम-धंधे में लगे दिखाई दिए। तभी किसी ने गरमा-गर्म चाय लाकर दी। पीते ही आत्म तृप्त हो गई। जयाड़ा जी के घर में अभी नया-नया शौचालय बना है। लेकिन अभी दरवाजा नहीं लगा है। फिर भी हम आज इसका प्रयोग करने वाले थे। सर बड़ियार घाटी की ग्रामसभा सर के तीन गांव सर, धिंगाड़ी और छानिका में केवल दो शौचालय हैं। यहां भी ग्राम प्रधान यलमी देवी के घर शौचालय नहीं है। शौचालय क्यों नहीं हैं, यह एक अलग विषय है। फिलहाल यात्री दल की स्थिति ऐसी थी कि एक व्यक्ति शौचालय में बैठा था, जबकि दूसरा बाहर पहरा दे रहा था।

    फ्रेश होने के बाद बाहर चौक में टहल रहा था, तभी एक प्यारी सी बच्ची हाथ पकड़कर अपनी रसोई में ले गई। पता चला उसकी दादी को बुखार है। वो तप रही थी। मैं उठा और तुरंत अपनी मेडिसन किट से दवा के तीन डोज (सामान्य दवा) बना लाया। कुछ खाने के बाद उन्हें दवा खाने की हिदायत दी। बोलीं, तुम्हें गढ़वाली आती है तो अपनी बोली में बात करो। मैंने उसने बात शुरू की तो उन्होंने आत्मीयता से सिर पर हाथ फेर दिया। इतनी देर में बच्ची की मां ने चाय बना दी थी। चूल्हे के पास बैठकर चाय पीने की हमेशा से हसरत रहती है। बचपन अपना ऐसे ही गुजरा है। लेकिन आज फिर यादें ताजें हो गईं।

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    सास-बहु और बेटी के साथ ये आत्मीयता से भरी एक मुलाकात थी। यही हमारी ग्रामीण संस्कृति है। जो एक अजनबी पथिक को भी अपने चूल्हे के पास स्थान दे देती है। वैसे तो ये गांव गढ़वाल का हिस्सा है, लेकिन यहां की बोली जौनसारी (रंवाई घाटी) के ज्यादा करीब है। ये लोग मेरी गढ़वाली तो समझ रहे थे, लेकिन इसनकी भाषा मेरे ज्यादा समझ में नहीं आ रही थी। खैर जब दिल मिलते हैं तो भाषा आढ़े नहीं आती। बावजूद इसके हमने देर तक बातचीत की। छोटी गुड़िया को मैंने जेब से निकालकर कुछ ड्राईफ्ट्स दिए तो वह खुश हो गई। इशारों में कहने लगी मेरी फोटो खींचों, मैंने भी उसे तत्काल मॉडल बना दिया। तस्वीरें आपके सम्मुख हैं।

    सर गांव, जहां कालिंगा नाग जी के मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है। मंदिर के पास पानी के सात धारे हैं। कहा, जाता है कि यह पानी सीधे सरुताल से आता है। सात धारों की वजह से ही गांव का नाम सर पड़ा। मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। ऐसा क्यूं है, इस विषय में समयाभाव के कारण में ज्यादा जानकारी नहीं जुटा पाया। गांव के सभी घर कैल, देवदार इत्यादि लकड़ी के बने हैं। यहां बफबारी के साथ इतनी ठंड पड़ती है कि कंकरीट या मिट्टी-पत्थर से बने घरों में रहना मुश्किल है। गांव में स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, परिवहन, खेती-बाड़ी, लिगांनुपात, महिलाओं की स्थिति, इनकी आर्थिकी सहित कई अन्य मुद्दे हैं, लेकिन इन पर फिर कभी बात करूंगा। वैसे भी कुछ मित्रों की शिकायत है कि मैं लंबा लिख रहा हूं। इसलिए इस कड़ी को संक्षेप में ही समेटने का भरकस प्रयास है।

    टीम लीडर रतन सिंह असवाल रात में पहले ही घोषणा कर चुके थे। सुबह का नाश्ता हम धींगाड़ी में ही करेंगे। इसके पीछे मंशा यही थी कि ग्रामीणों को किसी प्रकार की दिक्कत न हो। वैसे भी ये फसल समेटने का समय है। सभी चौलाई की कटाई-छंटाई में व्यस्त हैं। मुसीबत में एक रात का आसरा मिल गया, वही बहुत है। अब हम यहां से आगे करीब दो किमी पैदल रास्ता नापकर धींगाड़ी पहुंचेगे। हमारे साथ चल रहे गाइड कैलाश के घर में यात्री दल के लिए होम स्टे की व्यवस्था है। दूसरे गाइड राकेश का भी धींगाड़ी में ही घर है। रास्ते भर मुझसे पूछ रहा था सर- आप खाना पसंद करोगे। गांव में आपके लिए वही बनेगा। मैं बोला, जो भी प्यार से खिलाओगे, खा लेंगे।

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    आज का दिन आराम करने के लिए तय था। जल्दी ही हम सर गांव के लोगों से विदा लेकर धिंगाड़ी के लिए निकल लिए। रास्ते में पीठ पर फसल लादकर घर की ओर जाते कई महिला-पुरुष मिले। कुछ लोग आगामी फसल गेहूं की बुआई के लिए खेत तैयार कर रहे थे तो कुछ कटाई-छंटाई में लगे थे। हमने इन दृश्यों को अपने कैमरे में कैद किया। यहां भी रास्ते पानी के कई स्रोत मिले। सर और धींगाड़ी को खेत-खलिहान ही एक दूसरे को जोड़ते हैं। कहने को दो गांव हैं, लेकिन इनमें एक ही गांव जैसा परस्पर रिश्ता है। अब यात्री दल के सदस्य गांव के मुहाने पर थे तो दूसरी तरफ ग्रामीणों की ओर से स्वागत की पूरी तैयारी की गई थी। पारंपरिक वाद्ययंत्र ढोल-दमाऊ और फूलों की माला पहनाकर हमारा स्वागत किया गया। गांव में परदेशियों के आने से जैसे उल्लस का माहौल था। गांव के बच्चे इधर-उधर दौड़भाग कर इस कौतूहल का हिस्सा बन रहे थे। कैलाश के पिता श्री बीरपाल सिंह ने परिवार सहित अगुवानी कर यात्री दल का स्वागत किया और सबको उनके कमरे दिखाए। कुछ एक लोगों की व्यवस्था पास के ही दूसरे घर में की गई थी। यहां भी सभी लकड़ी के घर थे, जो दो मंजिला से लेकर पांच मंजिला तक थे।

    यहां आकर लगा अब हम सही जगह पहुंचे हैं। अभी सुबह के 9 बजे रहे थे। सभी से कहा गया कि वे अपनी सुविधानुसार नहा-धो लें, लेकिन कपड़े कोई नहीं धोएगा। वजह आस-पास नाले-धारों में पानी बेजां था, लेकिन इसे घर तक ढोकर लाना पड़ता था। यहां भी दूसरे गांवों की तरह सुव्यवस्थित पेयजल व्यवस्था नहीं थी। घंटे भर में सब रमन-चमन हो गए। अब गरमा-गर्म नाश्ता तैयार था। शुद्ध देसी घी में बना चौलाई का हलवा और स्टिल के गिलास में लबालब चाय। वाह…!!! आनंद आ गया। इसके बाद बारी थी दूप में बैठकर थकान उतारने की। जिसे तिबारी में जगह मिली, वह वहीं लटक गया तो कुछ लोग आंगन में कुर्सियों का घेरा बनाकर बैठ गए। कुछ
    उत्साही साथी गांव की चहल-पहल देखने निकल गए।

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    दोपहर का समय हो चला था। कैलाश के माता-पिता के साथ उसकी तीन बहनें और छोटा भाई दोपहर के खाने की तैयारी में लगे थे। तभी मैं किचन में पहुंचा। पूछा, मांजी क्या बना रहे हो? छोटी बहन ने उत्तर दिया- आपको क्या खाना है। मैं बोला, आप जो भी बना रहे होंगे अच्छा ही होगा, लेकिन मेरा मन इस व्यक्त चटपटी चटनी खाने को कर रहा है। बीए कर रही ये बालिका बोली-कौन सी चटनी खाओगे? मैं बोला-जो भी यहां पारंपरिक रूप से बनती हो, वो बना दो। बोली, ठीक है। कुछ देर बाद सबको खाने के लिए आमंत्रित किया गया। लकड़ी के खुले बरामदे में सलीके से दरी बिछाई गई थी। जिस पर बैठकर हमने भोजन किया। खाने में लाल चावल, रजमा की दाल, कंकोड़ों की सब्जी और मेरी डिमांड पर बनी चटनी मौजूद थी। वाह…!!! लाजवाब स्वाद। आत्मा जैसे तृप्त हो गई। यात्रा के दौरान हम हर चीज नाप-तौल और मौसम के हिसाब से शाररिक जरूरतों को देखते हुए भोजन ले रहे थे। लेकिन आज खाने में कोई बंदिश नहीं थी। सबने भर पेट ही नहीं उससे अधिक खाया। बना ही इतना स्वादिष्ट था।

    इसके बाद फिर से सब लोग इधर-उधर लुढ़क गए। सच कहूं तो यात्री दल के जो सदस्य आपस में परिचित नहीं थे, आज जान-पहचान बढ़ा रहे थे। कौन क्या करता है, कहां से आया है, कहां का रहने वाला है, … और भी बहुत कुछ। कुल मिलाकर सबने चैन से दिन गुजारा। शाम के समय सभी साथियों ने गांव का भ्रमण किया और उनके जीवन के बारे में जानने की कोशिश की। गांव के सभी लोग बड़ी आत्मियता से मिले। उनके लिए दूसरे मनुष्यों को देखना आम नहीं है। ज्यादातर लोगों की जिंदगी गांव तक ही ​सीमित है। इसलिए उनका हमें देखने का नजरिया भी कुछ अलग था। वे हमें गौर से देख रहे थे और हमारी हर गतिविधि पर खुशुर-फुशुर भी कर रहे थे। ये उनका जीवन था। जो वो अपने ढंग से जीते हैं। हम एक दिन के मेहमान थे, लेकिन उनके कठिन जीवन को देखकर हैरान थे। कई मायनों में अभागे तो कई में खुद से बहुत समृद्ध लगे ये लोग।

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    शाम ढलने को थी तो सभी साथी ठिकाने पर पहुंच गए। रात के खाने में क्या पक रहा है, इस पर भी चर्चा हो रही थी। आंगन में आग जल चुकी थी। जिसके चारों तरफ कुर्सियां लगाई गई थीं। अब दल के सभी सदस्यों ने एक-एककर यात्रा के अनुभव और उसके निहितार्थ को सामने रखा। भविष्य में इस ट्रैक को कैसे पर्यटन के नक्शे पर लाया जाए, इस पर भी गहन मंथन हुआ। इस चर्चा में गांव के कुछ वरिष्ठ सदस्य भी शामिल थे। इस बीच चाय के भी कई दौर चले। इसे आप कैंप फायर के साथ चाय पर चर्चा भी कह सकते हैं। रात के खाने में मासांहार खाने वाले साथियों के लिए ठेठ देसी तरीके से मटन की तैयारी थी। इसके अलावा तमाम दूसरे पकवान भी चूल्हे पर चढ़े थे। जिनकी महक बाहर आंगन तक आ रही थी। इस बीच खाने का एलान भी हो गया। सभी साथियों ने तृप्त होकर भोजन किया।

    FB_IMG_1541326723291अब बारी थी गाने-बजाने की। पहले गीत-संगीत का दौर चला और फिर अंताक्षरी का। जिसमें बड़े भाई दलवीर सिंह रावत और रतन सिंह असवाल जी ने अपने हुनर का बेहतरीन प्रदर्शन किया। अकसर गम्भीर मुद्रा में रहने वाले रतन सिंह असवाल जी का अलग ही रूप देखने को मिला। वे बच्चों के साथ जैसे खुद भी बच्चे बन गए। दलवीर भाई ने भी बखूबी साथ दिया। गानों के केंद्र में हमारे अविवाहित साथी नेत्रपाल यादव जी थे, जिन्हें सब जल्दी से शादी करने के​ लिए प्रोत्साहित कर रहे थे। नाचने में भी भाई दलवीर सिंह जी ने अपने हुनर का प्रदर्शन किया। इसके अलावा सिद्धार्थ, जितेश, प्रणेश सौरभ, सुनील ने भी जमकर ठुमके लगाए। कैलाश की तीनों बहनों (नाम याद नहीं) ने भी कमाल का हुनर दिखाया। वे गीत-संगीत के साथ ऐसे कदमताल मिला रहीं थीं, जैसे कोई मझे हुए कलाकार प्रस्तुति देते हैं। वैसे माना जाता है रंवाई घाटी के घर-घर में कलाकार पैदा होता है। इस बात को आज इन तीनों बालाओं ने सिद्ध कर दिया था। नाचने-गाने का दौर अभी चल ही रहा था, लेकिन मैं अपनी कमर को कुछ आराम देना चाहता था। इसलिए सबसे विदा लेकर सोने के लिए बिस्तर में
    घुस गया।

    आने वाला दिन यात्रा का अंतिम दिन था। गांव से सड़क तक पहुंचने के लिए अब हमें मात्रा छह किमी की पैदल दूर तय करनी थी, लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था….

    © जारी…

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