यहां आकर आप खुद को भूल जाते हैं और हिमालय के हो जाते हैं….

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    वरिष्ठ पत्रकार विनोद मुसान की वाल से…..

    #पलायन एक चिंतनः #हिमालय दिग्दर्शन यात्रा-तीन
    तीसरा दिन : (दिनांक 24 अक्टूबर 18)
    दुंदा बुग्याल से तलहटी
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    सुबह-सवेरे सूरज की किरणें हमारे कैंप तक नहीं पहुंची थीं, लेकिन उसकी लालिमा से सामने बर्फ से ढका हिमालय इतरा रहा था। एक छोर से दूसरे छोर तक उगते सूरज के साथ रंग बदलता हिमालय रूहानी दुनिया में होने का अहसास करा रहा था। जब आप उगते सूरज के साथ चांदी की चादर ओढ़े हिमालय को देखते हैं, तो बाकि दुनिया से आपका रिश्ता खत्म हो जाता है। तब
    आप जड़ हो जाते हैं, बस आपकी आंखें होती हैं, जो बिना पलक झपकाए इस अद्भुत दृश्य को कैद कर लेती हैं। हम भी बावले से हुए इस दृश्य को कुछ ऐसे ही देख रहे थे। साथी ट्रेकर अजय कुकरेती, नेत्रपाल यादव, प्रवीन भट्ट, इंद्र सिंह नेगी, सिद्धार्थ रावत और हमारे दल का सबसे छोटा सदस्य प्रनेश असवाल इस दृश्य को कैमरे में कैद करने में मशगूल थे, तो दूसरे साथी भी
    अपने मोबाइल कैमरों फोटोग्राफी का हुनर दिखा रहे थे।

    अब सूरज कैंप क्षेत्र के बुग्याल तक पहुंच चुका था। जिसने हमारी कंपकंपी थोड़ी कम की। पास में बहता एक झरना रात की ठंड में जम चुका था। कैंप में पीने के लिए भी पानी नहीं था। नित्यकर्म के बाद सबने टिशू पेपर से ही काम चलाया। एक-दो बहादुर साथियों ने झरने के पास जाकर ‘धोने’ का उपक्रम किया तो हाथ को कुल्फी बनाकर लौटे। तुरंत आग की शरण ली, तब जाकर राहत मिली। इसके तुरंत बाद कंमाडर रतन सिंह असवाल का आदेश जारी हो चुका था, घंटे भर में हम अगले पड़ाव की ओर कूच करेंगे। आज करीब 12 किलोमीटर की यात्रा करनी है। शाम होने से पहले हमें सरूताल के बेसकैंप तलहटी पहुंचना है। रास्ता बहुत ज्यादा ऊंचा-नीचा नहीं है, लेकिन उच्च हिमालय क्षेत्र में होने के कारण ऑक्सीजन की कमी हो सकती है।
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    सुबह करीब 9 बजे अब दल अपने साजो-सामान के साथ नई मंजिल की तरफ बढ़ चुका था। कुछ सीधे रास्तों के साथ ऊंचाई-निचाई नापने का क्रम जारी था। रास्ते में पड़ने वाले अधिकतर झरने ठंड में जमकर ग्लेशियर का अहसास करा रहे थे। जगह-जगह बर्फ के नुकीले तीर पिघलकर धरती में समाने का बेताब थे, लेकिन प्रकृति का चक्र उन्हें ऐसा करने से रोक रहा था। तभी किसी साथी का पैर पाले के साथ जमी बर्फ पर पड़ जाता था तो पीछे से दूसरा साथी चौकना होकर चलते की हिदायत दे देता। इस वक्त हम करीब 13 हजार फीट की ऊंचाई पर ऐसे रास्ते पर चल रहे थे, जहां पर्वत के एक तरफ दूर तक फैले बुग्याल थे तो दूसरी तरफ पठार और उनसे से
    भी नीचे ट्री लाइन (अच्छादित वन श्रृंखला) शुरू हो रही है। कुछ यू समझ लिजिए हमे पर्वत श्रृंखला के शीर्ष पर चल रहे थे, जहां से एक छोटा सा पत्थर भी लुढ़का दो तो वह कई किमी नीचे जाकर रूकेगा।

    दल के सदस्य अब तक तीन ग्रुपों में बंटकर आगे-पीछे चल रहे थे। जाहिर सी बात है, मैं सबसे पीछे वाले दल में था। जिओलॉजी का स्टूडेंट रहा हूं तो पहाड़-पठार और इसकी भू-संरचना को देखने का नजरिया भी कुछ अलग है। मेरे साथ इस वक्त सिद्धार्थ रावत, जितेश, प्रणेश असवाल, सौरभ असवाल, सुनील कंडवाल आदि साथी हैं। जो एक अच्छे स्टूडेंट की तरह मुझसे हिमालय की
    जिओलॉजी समझने की कोशिश कर रहे हैं। कॉलेज छोड़े 18 साल बीत चुके हैं, लेकिन डॉ. एके बीयानी सर (वर्तमान में डीबीएस पीजी कॉलेज के प्रचार्य) की हिमालयन जिओलॉजी की क्लास कभी बंक नहीं की। चमकते पत्थर इस वक्त मुझे अपनी जिओ लैब की याद दिला रहे हैं, मैं जानने की कोशिश कर रहा हूं कि इसमें वह कौन सा तत्व है, जो सूर्य की रोशनी में चांदी सा चमक रहा है। तभी एक शिला की ओर इशारा करते हुए सौरभ सवाल करता है, भईया ये कौन सी रॉक है और इसका आकार ऐसा क्यों है। तब मेरी फोल्ड और फॉल्ट की क्लास शुरू हो जाती है। भ्रंस और अपभ्रंस से शुरू हुई बातचीत आखिरकार भूगर्भीय संरचना से होकर भूकंप पर आकार खत्म होती है। इस बातचीत में हमारा करीब एक घंटे का सफर तय हो जाता है। इसी बीच साथ चल रहे मानवशास्त्री नेत्रपाल सिंह यादव हिमालय के विभिन्न रूपों से काव्यात्मक ढंग से हमें रूबरू कराते हैं।
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    हम जैसे-जैसे आगे बढ़ते, लगता बर्फ से ढकी हिमालय की चोटियों के करीब जा रहे हैं, बस सामने वाले पहाड़ को पार करते ही उसे छू लेंगे, लेकिन यह क्या एक पहाड़ को पार करते तो सामने दूसरा पहाड़ खड़ा नजर आता। ऐसा लगता मानों हिमालय हमसे और दूर चला गया है। पूरे रास्ते आंख-मिचौनी का ये खेल चलता रहा है। इधर, पर्वत के शीर्ष पर दो छोटे-छोटे ताल दिखाई दिए तो दल में शामिल एकमात्र महिला सहयात्री ने कुछ फोटेग्राफस लेने की इच्छा जाहिर की। जिसे मैंने सहृदय पूरा किया। अब दोपहर दो बजे का समय हो चला था। अब तक हम करीब 8 किमी की यात्रा पूरी कर चुके थे। इस पूरे रास्ते में कहीं भी पीने का पानी नहीं मिला था। अब तक हमारे पास जो पानी उपलब्ध था, वो अब खत्म हो चुका था। आगे चल रहा दल एक खाईनुमा स्थान पर दोपहर का खाना खाने के लिए हमारा इंतजार कर रहा था। खाईनुमा इस स्थान की उपयोगिता यह थी कि बर्फ जमी होने के बावजूद यहां पानी बह रहा था। मतलब हम खाना खा सकते थे और आगे की यात्रा के लिए पानी भर सकते थे। इसके बाद सबने साथ लेकर चले पूरी-आलू का स्वाद लिया और कुछ समय बाद आगे बढ़ चले।

    कुछ आगे बढ़े तो ढलाननुमा मखमली बुग्याल के मैदान दूर तक फैले थे। सामने पर्वतों पर चांदी सी बर्फ दूर तक चमक रही थी। मन कर रहा था इस बुग्यालों में लुढ़कते हुए चले जाएं। लेकिन ये सिर्फ एक ख्याली पलाव था, ऐसा करना जान से हाथ थोने जैसा था। कुछ देर इन बुग्यालों में सुस्ताने और छायाचित्रों को कैमरे में कैद करने के बाद हम आगे बढ़ चले। कुछ आगे बढ़े तो रास्ते में ग्लेश्यिरनुमा खाईयों से सामना हुआ। एक-दूसरे को सहारा देते हुए सावधानीपूर्वक हमने इन्हें पार किया। फिर सामने विशाल बुग्याल, चोटी पर सरूताल और और दूर तलहटी पर वह स्थान दिखाई दिया, जहां हमें पहुंचना था। मजे की बात इस स्थान का नाम भी तलहटी ही है। ये
    सरुताल का बैस कैंप कहलाता है। अब भी हम अपने छानी स्थल से तीन किमी दूर थे, लेकिन ढलाननुमा बुग्यालों में सामने ही दिखाई दे रहा था। आसपास बुरांश के झाड़ीनुमा पेड़ों की श्रृंखला दूर तक फैली थी। अब हम नीचे तलहटी में उतरकर भेड़ियालों की छानियों में रुकने वाले थे। यहां बर्फीली हवाओं का जोर था। सामने वह दिव्य पर्वत दिखाई दे रहा था, जिसके शीर्ष में सरुताल स्थित है। यहां पहुंचना हर पर्वातारोही का सपना होता है। अगले दिन हम वहीं पहुंचने वाले थे, लेकिन अब भी यह सपने जैसा ही लग रहा था।

    रतन सिंह असवाल (टीम लीडर), नेत्रपाल सिंह यादव, दलवीर सिंह रावत, अजय कुकरेती, इंद्र सिंह नेगी, विजयपाल सिंह रावत, प्रवीण कुमार भट्ट, तनुजा जोशी आदि सदस्य सबसे पहले कैंप स्थल तक पहुंचे। आज चढ़ाई-उतराई कम होने की वहज से हमने दूरी तय समय में पूरी कर ली थी। अभी शाम के चार बज रहे थे। सूरज चमक रहा था। इसलिए सभी उत्साहित थे। वरिष्ठ सदस्य पहले कैंप में पहुंच गए थे, युवा अपनी मस्ती में धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा थे। कमर के दर्द के कहराता, गिरता-पड़ता मैं यहां भी सबसे देर में पहुंचा। ये एक स्वर्ग सा सुंदर स्थान था। जहां आपको आलौकिक अनुभूति का अहसास होता है। आप सबकुछ भूल जाते हैं और खुद को प्रकृति के सुपुर्द कर देते हैं। लेकिन मैं पिछली रात की गलती यहां नहीं दोहराने वाला था। मैं क्या दल के सभी साथी ठंड को लेकर पहले से सजग थे। इस बार शाम होते-होते सभी की शॉल निकल आई। हाथ-मुंह धोने के बाद सभी ने सफर वाले कपड़े बदल लिए थे। गर्म मौजो पर विशेष जोर दिया गया। पिछली रात बहुत से सदस्यों को ठंड की वजह से नींद नहीं आई थी। धीरे-धीरे रात गहराने वाली थी, लेकिन किसी को समझ नहीं आ रहा था कि चांद किस दिशा से निकलेगा। हमारे पास कोई दिशासूचक यंत्र भी नहीं था। इसलिए देर तक भ्रम की स्थिति बनी रही।

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    गपशप, गाना-बजाना और फिर खाना खाना। थक कर फिर से स्लिपिंग बैग में घुस जाना। कुछ ऐसे ही खत्म होने जा रही थी ये रात….। अगले दिन सरुताल के सपने खुली आंखों में तैर रहे थे, लेकिन करीब 10 किमी की खड़ी चढ़ाई भी अभी से डरा रही थी। देखते हैं कल का मौसम कौन से नए रंग दिखाता है। जानने के लिए पढ़ते रहिए… मेरी यात्रा।

    © जारी….

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