नए ट्रेकिंग रुट की खोज कर लौटी पलायन एक चिंतन की टीम

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पलायन एक चिंतन द्वारा आयोजित छह दिवसीय हिमालय दिग्दर्शन यात्रा का देहरादून में समापन हो गया। 22 अक्टूबर को देहरादून स्थित मुख्यमंत्री आवास से रवाना हुई यात्रा 27 अक्टूबर को वापस देहरादून पहुंची। इस वर्ष की हिमालय दिग्दर्शन यात्रा में 15 ट्रेकर शामिल रहे जबकि इससे अधिक स्थानीय लोग इस यात्रा से जुड़े। इस यात्रा के माध्यम से उत्तराखंड की दो सीमान्त व विकास की दृष्टि से उपेक्षित दो नदी घाटियों टोंस व यमुना को जोड़ा गया। ट्रकिंग की शुरूआत मोरी क्षेत्र में टोंस की प्रमुख सहायक नदी गड्डूगाड़ से लगे अंतिम गांव देवजानी से की गई। केदारकांडा की श्रृंख्लाओं को पार करते हुए ट्रेंकिंग दल ने यमुना घाटी क्षेत्र में पथारोहण समाप्त किया। इस दौरान दल ने 12500 फीट की उचाई पर स्थित केदारकांडा पर्वत पर आरोहण करने के साथ ही एक नये ट्रेकिंग रूट की खोज भी की। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अंतर्गत टं्रेकिंग दल ने देवजानी गांव की ओर से केदारकांडा पर चढ़ाई की। केदारकांडा जाने के लिए अभी तक इस रूट का प्रयोग नहीं होता है और कहा जा सकता है यह रूट अभी अनटच्ड है। देवजानी गांव से केदारकांडा की दूरी 9 किमी है और इस रूट में सुन्दर सदाबहार जंगल, झरने व बड़े-बड़े बुग्याल हैं। देवजानी की ओर से केदारकांडा ट्रेक करने पर ट्रेकर कुलाका थाज, एरणी थाज व तालका थाज में कैंपिंग कर सकते हैं। कुलाका व एरणी थाज जहां जंगलों के बीच केदारगाड़ के किनारे स्थित हैं वहीं तालका थाज केदारकांडा के निकट बुग्याल पर स्थित है। इनके अलावा इस क्षेत्र में जौटा, लमड़िका, पत्थरफोड़ थाच में भी कैंपिंग की जा सकती है। पहले दिन के ट्रेंकिंग अभियान के बाद यात्री दल द्वारा दुंग्दा बुग्याल में भेड़ालों के लिए चिन्हित स्थलों पर रात्रिविश्राम किया गया। केदारकांडा के निकट स्थित यह स्थान लगभग 12500 फीट की उंचाई पर स्थित है और यहां से हिमालय हाथ की दूरी पर दिखाई देता है। यहा से ट्रेकिंग दल पूर्व दिशा की ओर ट्रेक करते हुए सरूताल के आधारकैंप तलहटी पहुंचा। जहां से दल को 25 अक्टूबर को सरूताल तक आरोहण करना था लेकिन मौसम खराब होने के कारण दल सरबडियार पट्टी के सर गांव की ओर चला। लगातार 17 किमी का ट्रेक करने के बाद दल ने सर गांव में होमस्टे किया। 26 अक्टूबर को दल ने सरबडियार पट्टी के ही दूसरे गांव घिंगाड़ी में पलायन एक चिंतन के कार्यकर्ता कैलाश रावत के घर होम स्टे किया। सर बडियार घाटी में बाइका थाच, मोड़का थाच और अखड़ थाच सुन्दर कैंम्पिंग स्थल के रूप में विकसित किए जा सकते हैं। 27 अक्टूबर को अभियान दल घिंगाड़ी गांव से राजगढ़ी पट्टी को पार कर गंगताड़ी से वाहन द्वारा देहरादून पहुंचा। अंतिम दिन भी दल द्वारा घिंगाड़ी गांव से गंगताड़ी तक लगभग 14 किमी का ट्रेक किया गया। 
समस्याएं 

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बुनियादी सुविधाओं की बात की जाए तो दोनों घाटियों में बुनियादी सुविधाओं का नितांत अभाव है और लोग आदिम युग में जीने को विवश हैं। एक ओर तो सरकार द्वारा पूरे उत्तरकाशी जनपद को खुले में शौच मुक्त घोषित किया गया है। वहीं दूसरी ओर देवजानी ग्राम सभा के देवजानी और जीवाणु गांवों में एक भी शौचालय नहीं है। यहां तक कि ग्राम प्रधान विमला देवी के घर पर भी शौचालय नहीं है। इसी प्रकार सर बडियार घाटी की ग्राम पंचायत सर के तीन गांवों सर, घिंगाड़ी और छानिका में केवल 2 शौचालय ही पाए गए। यहां भी ग्राम प्रधान यलमी देवी के घर शौचालय नहीं है। सर गांव में एक परिवार द्वारा इसी महीने शौचालय का निर्माण कराया गया है जिसके दरवाजे भी अभी नहीं लगे हैं जबबि घिंगाड़ी में कैलाश रावत के परिवार द्वारा इसी ट्रेकिंग अभियान को ध्यान में रखते हुए कुछ समय पूर्व ही शौचालय बनाया गया है।   
दोनों की घाटियों में इंटर स्तर तक भी शिक्षा की व्यवस्था नहीं है। इन गांवों से विद्याथियों को इंटर की पढ़ाई के लिए भी राजगढ़ी, पुरोला और बड़कोट में किराए के मकान लेकर रहना पड़ता है। आगे की पढ़ाई का अंदाजा आप स्वयं लगा सकते है। 
देवजानी गांव और आसपास के क्षेत्र में स्वास्थ्य की कोई बुनियादी सुविधा नहीं है। बीमार पड़ने पर यहां के लोगों को लगभग 50 किमी दूर पुरोला में ही स्वास्थ्य सुविधा मिल पाती है। इसी प्रकार सर बडियार घाटी के आठ गांवों के लिए सर गांव में  चार बेड का आयुर्वेदिक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है लेकिन वहां एक ही चर्तुथ श्रेणी कर्मचारी दल को मिला। इस अस्पाल में पानी और शौचालय की व्यवस्था भी नहीं है।  
यात्रा में शामिल दोनों क्षेत्रों में सरकार द्वारा पेयजल की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। देवजानी, जीवाणु, सर, घिंगाड़ी व छानिका आदि गांवों के ग्रामीण पूरी तरह से प्राकृतिक स्रोतों पर ही निर्भर हैं। 
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सड़क परिवहन का भी क्षेत्र में अभाव है। देवजानी तक तो इन दिनों सड़क निर्माण का कार्य चल रहा है। लेकिन सर बडियार के ग्रामीणों को आज भी राजगढ़ी-गंगताड़ी तक 10 किमी से अधिक पैदल चलकर घने जंगलों और नदियों के बीच सड़क तक पहुंचना पड़ता है। इस समूचे क्षेत्र में संचार की भी कोई सुविधा नहीं है। 
संभावनाएं
यह समूचा क्षेत्र पर्यटन, औद्यानिकी, जैविक खेती, उन व रेशा उद्योग की संभावनाआें से भरा पड़ा है। क्षेत्र में गड्डूगाड़ और बडियार गाड़ जैसी सदाबहार नदियों के किनारे कैंपिंग के साथ ही उच्च हिमालयी बुग्यालों में कैंम्पिंग ट्रेकिंग की संभावनाएं है। 
यह क्षेत्र 5000- 8000 फीट की उंचाई पर स्थित है और यहां सेब व इस प्रजाति के अन्य फलों के उत्पादन की संभावनाएं है। पर्याप्त भेड़ पालन के बावजूद यहां उन का समूचित उपयोग नहीं हो पाता है। यहां हैण्डलूम ट्रेनिंग व विपणन केन्द्र विकसित किए जा सकते हैं। यहां भेड़ों के लिए वेटनरी की सुविधा भी नहीं है। सर के ग्रामीण महेन्द्र ने बताया कि वेटनरी डाक्टरों का एक दल गांव में आया था लेकिन उन्होंने भी भेड़ों की कोई जांच नहीं की। समूचे क्षेत्र में आर्गेनिक खेती होती है सिंचाई की समुचित सुविधाएं है लेकिन आर्गेनिक खेती के लिए बाजार नहीं है। यहां घी और शहद उत्पादन की संभावनाएं भी हैं।  
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पलायन एक िंचंतन के संयोजक रतन असवाल ने बताया कि नए-नए पर्यटक स्थलों को खोजने और उन्हें हाइलाइल कर गांवों में रोजगार विकसित करने का हमारा अभियान लगातार जारी है और इस अभियान में हमें सफलता भी मिल रही है। इस वर्ष भी हम देवजानी से केदारकांडा एक नया ट्रेक सामने लाने में कामयाब रहे हैं। 
ट्रेकिंग दल में रतन असवाल, विजयपाल रावत, प्रवीन कुमार भट्ट, नेत्रपाल यादव, तनुजा जोशी, अजय कुकरेती, विनोद मुसान, इन्द्र सिंह नेगी, सिद्धार्थ रावत, दलबीर रावत, जितेश, प्रणेश असवाल, सौरभ असवाल, सुनील कंडवाल शामिल थे।    
यात्रा इस प्रकार रहीः-
22 अक्टूबर : देहरादून से देवजानी गांव
23 अक्टूबर : देवजानी से केदारकांडा होकर दुंग्दा बुग्याल
24 अक्टूबर : दुंग्दा से तलहटी 
25 अक्टूबर : तलहटी से सर गांव
26 अक्टूबर : सरगांव से घिंगाड़ी गांव
27 अक्टूबर : घिंगाड़ी गांव से राजगढ़ी – गंगताड़ी तक पैदल और फिर वाहन से देहरादून।
 

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