पत्रकार सुशील बहुगुणा को मिला प्रतिष्ठित RED INK पुरुस्कार

एनडीटीवी की रचनात्मक पत्रकारिता को फिर से मान्यता मिली है। एनडीटीवी इंडिया की टीम के दो सदस्यों को पत्रकारिता के प्रतिष्ठित रेड इंक सम्मान से नवाज़ा गया है।अपने पर्यावरण प्रेम के लिए पहले से सुख्यात और एकाधिक बार पुरस्कृत सुशील बहुगुणा को इस बार यह सम्मान भारत-नेपाल सीमा पर बन रहे पंचेश्वर बांध के खतरों की रिपोर्ट करने के लिए मिला है। वहीं सुशील महापात्रा को कबाड़ पर जीएसटी के असर पर उनकी रिपोर्ट के लिए सम्मानित किया गया। आइये जानते हैं पुरस्कार मिलने के बाद क्या कहा सुशील बहुगुणा ने उन्हीं की वॉल से...

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सम्मान विनम्र बनाता है और उसके बारे में ख़ुद बताना काफ़ी संकोच में भी डालता है। प्रतिष्ठित Red Ink सम्मान को लेकर मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही है। मुंबई में ये सम्मान हासिल हुआ। पर्यावरण के क्षेत्र में मेरी डॉक्यूमेंटरी पंचेश्वर की पड़ताल को इसका हक़दार चुना गया। इसके लिए आयोजकों मुंबई प्रेस क्लब और सम्मानित जूरी का तहे दिल से शुक्रिया।

पंचेश्वर डॉक्यूमेंटरी पर काफ़ी समय से काम करना चाह रहा था, मेरे प्यारे सहकर्मी और भाई Hridayesh Joshi ने कहा कि ख़ुद एक बार ज़रूर देख कर आओ कि सरकार आख़िर कर क्या रही है। हृदयेश इस बारे में एक आर्टिकल लिख चुके थे। फिर जब डॉ शेखऱ पाठक ने कहा कि सुशील अभी नहीं तो कभी नहीं तो मैं तुरंत इसके लिए अकेले गाड़ी में निकल पड़ा। पिथौरागढ़ से डॉ ललित पंत ने हिदायत दी कि अकेले मत जाओ, भटक भी सकते हो. पहाड़ में काफ़ी घूमा हूं लेकिन उस ओर पहले कभी गया नहीं था। डॉ पंत ने अपने भतीजे Suneel Pant को मेरे साथ जाने का ज़िम्मा दिया। रुद्रपुर से हम दोनों साथ हुए और अगले चार दिन एक हज़ार किलोमीटर से ज़्यादा हमने गाड़ी से नाप दिया।

गांव-गांव, नदी के साथ कई उन इलाकों में पहुंचे जो डूब क्षेत्र में आएंगे। आम लोगों की बातें, विशेषज्ञों की जानकारियां फोन के कैमरे में भी रिकॉर्ड कीं और अपने दिल में भी। शिक्षा और रंगकर्म के क्षेत्र में सक्रिय सुनील भाई सभी जगहों से वाकिफ़ थे। बीच में हम अपने कई अनुभव एक दूसरे से साझा करते रहे। एक दो मित्र और रास्ते में मिले। बीच में ख़ुद डॉ ललित पंत हमें पिथौरागढ़ और झूलाघाट ले गए। पंतजी की पत्नी ने बड़े प्यार से घर में ठहराया, ये महसूस नहीं होने दिया कि मैं पहली बार उनके घर पहुंचा हूं।

हम नेपाल की सीमा में भी घुसे। वहां चुनाव चल रहा था इसलिए कई पाबंदियां थीं। सो उनका लिहाज कर कुछ कैमरे में रिकॉर्ड किया, कुछ नहीं कर पाए। लेकिन काफ़ी कुछ जानकारियां समेटते रहे। अंत में अल्मोड़ा आकर मैं और सुनील भाई अलग हुए. मैं श्रीनगर की ओर निकल गया डॉ Sarswati P Sati से मिलने। उनका साथ हर बार जानकारियों से भरा होता है और उत्साह भी भर देता है। जो कुछ मैंने देखा, जाना वो सब उनके साथ साझा किया, उसके वैज्ञानिक पहलुओं पर हिमालय के प्रख्यात जियोलोजिस्ट डॉ नवीन जुयाल से भी फ़ोन पर ख़ूब बात की।

राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के निदेशक डॉ विनीत गहलोत और नदियों, बांधों के बड़े जानकार हिमांशु ठक्कर से ख़ूब सारी जानकारियां हासिल कीं। उनकी और कई अन्य विशेषज्ञों की रिसर्च का अध्ययन किया और फिर जो कुछ बना वो सीमित समय में इस डॉक्यूमेंटरी में दिखा पाया। जब सत्ता और उसकी ताक़त झूठ को सच बनाने पर आमादा हो जाए और काले को सफ़ेद दिखाने लगे तो पंचेश्वर जैसी परियोजनाएं पनपती हैं। लेकिन मुझे फिर भी पूरा यकीन है कि पर्यावरण का भयानक नुकसान कर झूठ के पुलिंदे की बुनियाद पर बन रही ये परियोजना ज़्यादा आगे नहीं बढ़ पाएगी। लेकिन पैसे का काफ़ी नुकसान ज़रूर हो जाएगा।

देखते हैं आगे क्या होता है। शायद हमारी सरकारों को समय पर समझ आ जाए कि ऐसी परियोजनाएं कितनी घातक हैं। क्यों घातक हैं ये बताने की कोशिश इस डॉक्यूमेंटरी में की है। जो साथी नहीं देख पाए उनके लिए लिंक नीचे साझा कर रहा हूं।

आप सभी की शुभकामनाओं के लिए तहेदिल से धन्यवाद जो हम जैसे नाचीज़ पत्रकारों का हौसला बढ़ाती हैं. एनडीटीवी में मेरे सहयोगी सुशील महापात्रा को भी ढेरों शुभकामनाएं। उनकी सीरीज़ को बिज़नेस एंड इकॉनमी सेक्शन में Red Ink सम्मान के लिए चुना गया। सुशील महापात्रा की सक्रियता और जोश हमारे आसपास लगातार ऊर्जा का प्रवाह बनाए रखता है. आप सभी का आभार।
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  1. महोदय अपनी खबरें में पहाड़ की पीड़ा खासतोर प्रतापनगर टिहरी की, टिहरी बांघ से प्रभावित हैं हम, महोदय हमारी लमबगांव को जोड़ने वाले पुल व सड़क डूब
    चुकी हैं, टिहरी बांघ के अधिकारी क्यों नहीं अंदाज लगा
    सके कि यह क्षेत्र के लोग कैसे आवगमन करेंगे, अरे रास्ते बनाए परंतु पूरा लमबगांव ठग दिया, उनमें बस या भारी वाहन नहीं जा सकते, आप देख लो लमगांव विशवनाथ सेवा नहीं चलती, बहुत समस्याएं हैं न, आप जैसै पत्रकार हमारा उद्धार कर सकते, कृपया खबरें बनाए,

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