जहां हल-बैल नहीं लेकिन खेती होती है उम्दा

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    पलायन :एक चिंतन आंदोलन के संयोजक रतन सिंह असवाल अपने एक सप्ताह की नार्थ ईस्ट यात्रा से वापस दून पहुंच चुके हैं। श्री असवाल इस बात से बहुत अचंभित हैं कि सुदूरवर्ती राज्य अरुणाचल प्रदेश के जीरो-घाटी में आज भी न तो बैल हैं और न हल, लेकिन खेती होती है बहुत उम्दा। जी हां, यहां न कोई ट्रैक्टर है और न कोई आधुनिक कृषि-यंत्र और है तो सब पारंपरिक। दरअसल, अरुणाचल प्रदेश के पहाड़ मिट्टी से बने हैं और जहां भी घाटी है उसे खेतों में तब्दील कर दिया गया है। घाटियों में पानी की बहुलता होने से खेतों में पानी भर दिया जाता है और खेतों में धान की रोपाई आसानी से हो जाती है। यहां का धान पूर्णतः जैविक खेती पर आधारित है। धान काटने का भी नया प्रयोग यह देखने को मिला। सिर्फ बाली काटी जाती है और साथ-साथ टोकरे में उसे झाड़ भी दिया जाता है। धान की पराली को खेतों में ही छोड़ दिया जाता है। पशुओं की संख्या न के बराबर होने से उसका कोई उपयोग नहीं है। वैसे भी जीरो घाटी के जंगल बिबिध प्रकार की वनस्पति से लैस है। वहां हरे चारे की कोई कमी नहीं है।

    *धान की खेती के साथ-साथ मछली कि खेती भी:*

    जी हां, धान तो धान लेकिन साथ में मछली की खेती भी। जीरो घाटी में यह अनूठा और सफलतम प्रयोग सदियों से हो रहा है। पलायन:एक चिंतन के संयोजक श्री असवाल ने बताया कि जीरो घाटी में धान की खेती के साथ:साथ मछली कि खेती भी होती है। वहां के लोग धान के साथ मछली के बीज भी डाल देते हैं और खेतों में बराबर पानी रखते हैं, इससे खेतों में कीड़ा भी नहीं लगता है और प्रचुर मात्रा में मछली भी हो जाती हैं। इन मछलियों को धान काटने से पहले खेतों से निकाल लिया जाता है। इनको सुखाकर ठंड के दिनों के लिए रख दिया जाता है। एक एक खेत में पर्याप्त मछली साल भर के लिए हो जाती है। कीवी की खेती ने पहचान दी जीरो घाटी इलाके को;

    श्री रतन सिंह असवाल ने अपने अनुभवों को शेयर करते हुए बताया कि अरुणाचल प्रदेश ने उद्यानिकी के क्षेत्र में विशेष नाम कमाया है और आज देश का प्रमुख कीवी उत्पादक राज्य बना है। यही नहीं कीवी की स्थानीय खपत वहां एक स्थानीय महिला उद्यमी द्वारा स्थापित वाइन फैक्ट्री में हो रही है।

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